hum hia jee

hum hia jee

Friday, March 26, 2010

हाँ कर दे !

कभी चाहते थे इतना कि हम उनके दिल-ए-अजीज़ थे ।
आज देखना भी गवारा नहीं करते ।।
हमसे क्या हुई ख़ता इतना तो बता दे ।
रहमत होगी अगर तू पास आये ।।
मैं हर मुिश्कल से लड़ लेता ।
तुम अगर साथ देते ।।
ऐ दोस्त आजा तू एक बार ।
स्ुना सुना सा है दिल मेरा ।।
बस कह दे तू हाँ मेरे यार एक बार ।
दूर ही सही कि तू मेरे पास है ।।
हवाएं ले आयेंगी तेरी खुश्बू ।

Monday, March 22, 2010

क्या मैं महिला आरक्षण विरोधी हूँ ?

आखिरकार जैसी आशंका सबको थी वही हुआ और एक बार फिर मुश्किल बाधा दौड़ पार करने के बाद आम सहमति के नाम पर कांग्रेस ने महिला आरक्षण बिल की आसान बाधा दौड़ पूरी करने से इनकार कर दिया। ज्यादातर लोग यही कहेंगे कि ये तो होना ही था। लेकिन, क्यों। इसका जवाब ज्यादातर लोग यही देंगे कि कांग्रेस यही चाहती थी। लेकिन, क्या कांग्रेस और देश की सबसे ताकतवर महिला सोनिया गांधी भी यही चाहती थीं। जवाब कड़े तौर पर ना में हैं। वैसे तो, ज्यादातर टीवी चैनलों और अखबारों ने बिल के राज्यसभा में पास होने को सोनिया गांधी का निजी संकल्प बताया ही लेकिन, मुझे एक सांसद ने जब ये बताया कि प्रणव बाबू तो, बिल के खिलाफ थे। उन्होंने कहाकि सरकार चली जाएगी, बावजूद इसके सोनिया ने कहा- सरकार जाती है तो, जाए- बिल पास कराइए। फिर कौन क्या कहता और बिल राज्यसभा में पास हो गया। फिर बिल में अड़ंगा क्यों लग रहा है। सरकार को इस मसले पर बीजेपी, लेफ्ट का पूरा समर्थन है। लेकिन, दरअसल इसी में महिला आरक्षण के अंटकने की असली वजह छिपी है।

कांग्रेस और बीजेपी भले ही व्हिप जारी करके अपने सांसदों को महिला आरक्षण पर वोट डालने के लिए राजी कर लें, सच्चाई ये है कि कांग्रेस-बीजेपी दोनों के बहुतायत सांसद महिला आरक्षण के विरोधी हैं। इसीलिए लालू प्रसाद यादव के ये कहने पर कि 90 प्रतिशत कांग्रेसी सांसद कह रहे हैं कि महिला आरक्षण डेथ वारंट है, इससे बचा लीजिए तो, भी कांग्रेस की ओर से इसका कोई कड़ा प्रतिकार नहीं आय़ा। ये तो हुई महिला आरक्षण के अंटकने की बात लेकिन, क्या महिला आरक्षण मिल जाए तो, लोकतंत्र सुधर जाएगा। संसद की 33 प्रतिशत सीटों के जरिए उनको उनका हक मिल जाएगा। जवाब ईमानदारी से खोजेंगे तो, साफ पता चलेगा कि जवाब ना में है।

महिला आरक्षण कांग्रेस और बीजेपी दोनों के लिए उबले आलू की तरह है जो, न तो उगलते बन रहा है न निगलते। लेकिन, ये राष्ट्रीय पार्टियां हैं और इनके बड़े नेताओं को भरोसा है कि किसी न किसी सीट से वो तो, जीतकर संसद में पहुंच जाएंगे। डरे छोटे नेता जो, टिकट के लिए संघर्ष करते और अपनी जमीन बताने निपट जाते हैं उन्हें ये आरक्षण अपनी गर्दन पर रखी छुरी की तरह लग रहा है। और, सच्चाई भी यही है कि ये आरक्षण देश में लोकतंत्र का इतिहास बदलेगा लेकिन, साथ में लोकतंत्र का मखौल बनाने का जरिया भी बन जाएगा।

अब सोचिए जरा महिला आरक्षण मतलब 100 में से 33 सीटों पर सिर्फ महिलाएं लड़ेंगी, पुरुषों को लड़ने का हक ही नहीं होगा। यानी प्रतिस्पर्द्धा से नेतृत्व निखरने की लोकतंत्र की पहली शर्त पर ही महिला आरक्षण चोट करेगा। जाहिर है महिलाओं के लिए आरक्षित लोकसभा सीट पर कोई पुरुष नेता नहीं बनना चाहेगा और वो, क्षेत्र के लिए चिंता बिल्कुल ही छोड़ देगा। और, चूंकि ये आरक्षण रोटेशनल आधार पर यानी एक बार ये लोकसभा तो, दूसरी बार बगल वाली लोकसभा को महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिया जाएगा। तो, जाहिर है जाने-अनजाने इन क्षेत्रों से स्वाभाविक नेतृत्व ही खत्म होता जाएगा। इस आरक्षण का फायदा उन सामंती परिवारों को आसानी से मिल जाएगा जो, राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक-अपराधिक तौर पर पहले से बेहद बलशाली भूमिका में हैं। होगा ये कि अपराधियों को खत्म करने की संभावना दिखाने वाला ये महिला आरक्षण, महिलाओं की आड़ में अपराध रक्षण का बड़ा हथियार बन जाएगा। ये दलिता, पिछड़े आरक्षण की तरह नहीं है। जरा सोचकर बताइए ना किस बाहुबली सवर्ण या फिर बाहुबली दलित-पिछड़े के घर की महिलाओं को उनका अधिकार न देने की ताकत सामान्य लोगों में होती है। किसी राजनीतिक तौर पर प्रभावशाली परिवार चाहे वो, जिस जाति का हो, उस परिवार की महिलाओं का हक भला कौन मार रहा है या मार सकता है।

मुझे चक दे इंडिया फिल्म का वो, दृश्य याद आ रहा है जिसमें महिला हॉकी टीम कड़े मुकाबले में पुरुषों से हार जाती है लेकिन, ऐसा जज्बा उनके दिलो दिमाग में घर कर जाता है कि वो, वर्ल्ड कप हासिल करके लौटती हैं। मेरा तर्क ये है कि अगर महिलाओं को सही मायनों में पुरुषों के बराबर हक देने की बात हो रही है तो, महिलाओं के लिए अलग कोना खोजकर उन्हें कमजोर ही बनाए रखने की और देश में नेतृत्व खत्म करने वाला ये बिल क्यों लाया जा रहा है।

तर्क ये आता है कि महिलाओं को आरक्षण मिलेगा तो, कम से कम 33 प्रतिशत सीटों पर महिलाएं तो, आएंगी। और, इससे लोकसभा का माहौल सुधरेगा। ये आरक्षण के बूते संसद में पहुंची महिलाएं कैसे माहौल सुधार पाएंगी। वो, भी ज्यादातर ऐसी होंगी जो, बमुश्किल ही अपनी ही पार्टी में मौजूद नेता पति की आज्ञा की अवहेलना कर सकेंगी। और, अगर महिलाओं को आरक्षण दिए बिना उनका हक नहीं मिलेगा ऐसी सोच है तो, पुरुषों के साथ मैदान में ताल ठोंककर सबको चित करने वाली भारतीय राजनीति में सबसे ताकतवर (महिला या पुरुष) सोनिया गांधी जैसा नेतृत्व आरक्षण से पैदा होने की उम्मीद हम कैसे पाल पाएंगे। भले ही सोनिया के नाम के आगे गांधी लगा हो लेकिन, जिस तरह विदेशी मूल की बहती विरोधी बयार के बीच इस महिला ने खुद को साबित किया है वो, दिखाता है कि नेतृत्व चाहे महिला का हो या पुरुष का बिना प्रतियोगी माहौल के बेहतर नहीं हो सकता है।

लोकसभा में भाजपा नेता सुषमा स्वराज और कम्युनिस्ट पार्टी की पहली महिला पोलित ब्यूरो सदस्य वृंदा करात ही भला किस महिला आरक्षण से इतनी प्रतिभा जुटा पातीं। किस पुरुष राजनेता में इतनी ताकत है कि वो मायावती, ममता बनर्जी, जयललिता को खारिज करने का साहस जुटा सके। महिलाएं लोकसभा-विधानसभा में चुनकर आएं समस्या इससे नहीं है। समस्या इससे है कि संसद-विधानसभा में पहुंचने का लॉलीपॉप देकर महिलाओं के लिए एक अलग कमजोर कोना तैयार कर दिया जाए। समस्या इससे है कि महिलाओं को उनका हक देने के परदे के पीछे हमेशा महिलाओं को पुरुषों से कमजोर साबित कर दिया जाए।

लालू-मुलायम के भले ही इसके विरोध में अपने दूसरे हित छिपे हों। लेकिन, मुलायम की ये बात ज्यादा दमदार लगती है कि पार्टियों को खुद से क्यों नहीं महिलाओं को टिकट देना चाहिए। चुनाव आयोग उनकी मान्यता समाप्त करने का डर भी उन्हें दिखा सकता है। टिकट के दंद फंद में महिलाएं न फंसें ये तो, फिर भी जायज माना जा सकता है चुनावी दौड़ में आधी आबादी पुरुषों को लड़ाई से ही बाहर कर दिया जाए ये तो, एक नई विसंगति पैदा करने की कोशिश है।

राजनीति में ही नहीं कॉरपोरेट और दूसरे क्षेत्रों में जिन महिलाओं ने बिना आरक्षण के अपना मुकाम बनाया है उनकी ताकत सब मानते हैं वरना तो, ज्यादातर बॉसेज की सेक्रेटरी का पद महिलाओं के लिए ही आरक्षित होता है। लेकिन, क्या वो महिला को उसका हक दिला पाता है। क्या वो, महिला सशक्तिकरण के दावे को मजबूत करता है। बिल्कुल नहीं। महिला सशक्तिकरण का दावा मजबूत होता है। पेप्सिको चेयरमैन इंदिरा नूई के कामों से, ICICI बैंक की CEO चंदा कोचर से, HSBC की नैना लाल किदवई से, पहली महिला IPS अधिकारी किरण बेदी को देखकर महिलाओं को मजबूती मिलती है। ये लिस्ट इतनी लंबी है कि किसी के लिए उसे एक जगह संजोना मुश्किल है।

इसलिए भारतीय राजनीति में महिला आरक्षण के लिए जरिए सामंती परंपरा को और मजबूत करने की कोशिश का विरोध होना चाहिए। भारतीय नेतृत्व को कमजोर करने की इस कोशिश का विरोध होना चाहिए। महिलाओं को पुरुषों की प्रतियोगिता से बचाकर उन्हें पुराने जमाने में ठेलने की इस कोशिश का विरोध होना चाहिए। राजनीति में महिलाओं को उनका हक देना ही है तो, कांग्रेस-बीजेपी अगले किसी भी चुनाव में 33 प्रतिशत क्या पचास प्रतिशत महिलाओं को टिकट देकर महिला सशक्तिकरण पर अपना भरोसा दिखा सकती हैं। किसी अपराधी, बाहुबली, धनपशु के खिलाफ किसी भी महिला को शायद ज्यादा लोगों का समर्थन मिल जाएगा। सोचिए क्या महिला आरक्षण देश में एक अजीब विसंगति की जमीन नहीं तैयार कर रहा है। इसलिए महिलाओं के हक के लिए महिला आरक्षण का विरोध कीजिए। क्योंकि, सच्चाई यही है कि अगर महिलाओं की सीट आरक्षित हुई तो, ये प्रभावशाली लोगों (राजनैतिक-आर्थिक-अपराधिक) के पूरे परिवार को आसानी से संसद और विधानसभा में पहुंचने में मदद करेगा।

ये विकास है या पतन ?......

किसी भी समाज की पहचान वहां के साहित्य और आसपास के माध्यमों की रंगत देखकर पहचाना जा सकता है। अकसर हम इस बात की चर्चा तो करते रहते हैं कि देश में हर क्षेत्र में गिरावट आ रही है। क्या नेता, क्या पत्रकार, क्या न्यायपालिका, क्या प्रशासन, व्यापारी और क्या .. कोई भी, सबका स्तर दिनोंदिन गिरता जा रहा है। अब सवाल ये है कि जिसे हम समाज की गिरावट मानकर चल रहे हैं कि उसे क्या सचमुच समाज गिरावट मान रहा है या ये पुराने-नए का ऐसा फर्क हो गया है कि नए के जीने के तरीके को पुराने लोग समाज की गिरावट मानकर खारिज कर रहे हों। पता नहीं हम तो पीढ़ी के लिहाज से न तो अतिआधुनिक में हैं न पुरातनपंथी। तो, सबसे ज्यादा भ्रमित भारत हम जैसे लोग ही हैं।

UTV Bindass चैनल पर एक शो आजकल आ रहा है इमोशनल अत्याचार। ये फिल्म DEV D के गाने कैसा तेरा जलवा ... कैसा तेरा प्यार .. तेरा इमोशनल अत्याचार। फिल्म में अभिनेता के इमोशनल अत्याचार में ढेर सारी लड़कियों के साथ संबंध थे तो, बिंदास के शो में लड़की या लड़का अपने प्रेमी की परीक्षा लेता है जिसमें अकसर लड़की का प्रेमी चैनल की हीरोइन के चक्कर में फंस ही जाता है। ये एक नमूना है। इसी चैनल की नई प्रोमो लाइन में एक लड़की कहती है कि बिंदास हूं इसका मतलब ये तो नहीं कि मैं सबके साथ सोने के लिए तैयार हूं। ऐसी ही लड़का कहता है कि मैं बिंदास हूं इसका मतलब ये नहीं कि मैं ड्रग्स लेता हूं।

सबसे ज्यादा सुना जाने वाले रेडियो स्टेशन का दावा करने वाला RED FM का स्लोगन है ये आप के जमाने का रेडियो स्टेशन है, बाप के जमाने का नहीं। आप के जमाने का रेडियो स्टेशन साबित करने के लिए गाने के बीच-बीच में रेडियो जॉकी सवाल पूछता रहता है कि क्या आपको लगता है कि रियलिटी शोज हमारी संस्कृति भ्रष्ट कर रहे हैं या फिर क्या आपको बड़े होकर डॉक्टर, इंजीनियर या वकील बनना है तो, काइंडली कट लीजिए क्योंकि, ये आज के जमाने का रेडियो स्टेशन है बाप के जमाने का नहीं। वैसे तो, ये सुनते वक्त बस बिंदास रेडियो जॉकी की चुहलबाजी या रेडियो स्टेशन की मस्ती भर लगती है लेकिन, थोड़ा ध्यान से सुनें तो, समझ में आता है कि ये सचमुच कैसे हंसते-गाते हमारी संस्कृति का बैंड बजा देते हैं।

RED FM पर गाने सुनते हुए मैं वैलेंटाइन डे के आसपास सफर कर रहा था। रास्ते में एक रेडियो डॉकी का नाम सुना तो, दंग रह गया। उसने चहकते हुए बताया मैं हूं हरामखोर अविनाश। वो, पूरे कार्यक्रम के दौरान लड़के-लड़कियों से अपनी हरामखोरी साबित करने को कह रहा था। और, हरामखोरी मैसेज करने के लिए नंबर भी बता रहा था साथ ही ये प्रलोभन भी कि अगर हरामखोरी जंची तो, वैलेंटइन डे पर वो, बेहतरीन हरामखोरी भेजने वाले लड़के या लड़की को स्टूडियो बुलाएगा। वैलेंटाइन डे के शो का नाम भी था लगी लव की। लव की लगती भी है ये पहली बार सुना।

विज्ञापन भी कुछ इसी तरह से बदलते जमाने के लड़के-लड़कियां तैयार कर रहे हैं। सुरीले जिंगल और प्रति सेकेंड प्लान के साथ मोबाइल बाजार में उतरा टाटा डोकोमो का विज्ञापन में एक लड़का-लड़की साथ बैठे हैं। लड़के की नजर एक दूसरी लड़की पर पड़ती है और वो, लड़की को बातों में फंसाकर दूसरी लड़की के साथ जरा मस्ती के चक्कर में उठता है जाते समय देखता है कि उसकी गर्लफ्रेंड ने दूसरा ब्वॉयफ्रेंड पकड़ लिया। थोड़ा सा वो, हतप्रभ दिखता है फिर मुस्कुराता है और नई गर्लफ्रेंड के साथ चल देता है। पीछे से टाटा डोकोमो का संदेश सुनाई देता है when everyday there is new plan then why take fix mobile plan. Tata docomo daily plan. ये नए जमाने का दर्शन हम जैसे लोगों को डरा रहा है। शायद हम पुरातनपंथी हो रहे हैं क्या पता नहीं।

Friday, March 12, 2010

होली खेलना मना है .................
पिछले दिनों कालेज परिसर में होली खेलने के जुर्म में कुछ विद्यार्थियों के पहचान पत्र ले लिए गए.....क्यों हिल गए न कि भारत में भी ऐसा हो सकता है ....जी हाँ जामिया मिल्लिया इस्लामिया में होली के पहले कुछ विद्यार्थियों ने एक दुसरे को रंग गुलाल लगाने शुरू किये ।कुछ देर बाद ही गार्ड ने आ कर उन सभी विद्यार्थियों को पहचान पत्र देने को कहा , इससे पहले कि वो लोग कुछ समझ पाते उन्हें प्रोक्टर के पास ले जाया गया । विद्यार्थियों ने बताया भी कि उन्हें नहीं पता कि जामिया में होली खेलना मन है ,नाहीं कही नोटिस लगे गई थी,लेकिन उन्हें तुरंत घर चले जाने को कहा गया। छात्रों के सामने ही एक गार्ड ने वारलेस से सभी गार्डों को सुचना दी कि कैम्पस में घूमते रहो अगर कोई होली खेलता दिखे तो पकर के ले आओ । खैर ..छात्र बिना आई कार्ड के ही वापस आ गए ।
होली के बाद उनके आई कार्ड डिपार्टमेंट में ये कह कर भेज दिया गया कि ये लोग शोर मचा रहे थे जिससे दूसरी class disturb हो रही थी जबकि वहां एक ही क्लास हो रही थी वो भी दूर ...... मामले पर लिपा-पोती करने के लिए झूट का सहारा लिया जा रहा है। बेचारे विद्यार्थी सोच-सोच के परेशान हो रहे हैं कि जब उसी परिसर में ईद पर गले मिल सकते हैं ,इफ्तार कर सकते हैं, यहाँ तक कि डिपार्टमेंट कि तरफ से इफ्तार पार्टी का आयोजन किया जाता है .........तो फिर होली खेलने पे उनके साथ ऐसा क्यूँ हुआ? जबकि जामिया को गंगा-जमुनी तहज़ीब के लिए जाना जाता है । इस घटना के बाद गंगा-जमुनी तहज़ीब कि पोल खुलती नज़र आ रही है। आपकी क्या राय है हमे ज़रूर बताएं.......

Friday, March 5, 2010

उठो ,जागो और आगे बढ़ो ........

मित्रो, मार्च आते ही परीक्षा का दौर शुरू होता है. बोर्ड की परीक्षाएं शुरू हो चुकी हैं. सभी विद्यार्थियों और उनके माता-पिता के लिए ये एक महत्वपूर्ण दिन होते हैं. मैं, देश के भविष्य, अपने उन सभी युवा मित्रों को जो कि कक्षा X और XII की परीक्षा में बैठेंगे उन्हें शुभकामनाएं देता हूँ. सभी उपलब्धियों की जड़ों में अथक परिश्रम, लगन और समर्पण होते है. जीवन की इस यात्रा में हमें मिली सभी सीखों का परीक्षण होता रहता है. इस मायने से हम सभी विद्यार्थी हैं. यहाँ मैं स्वामी विवेकानंद की कुछ पंक्ति quote करना चाहता हूँ: "उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक मत रुको." परीक्षाएं तो जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है. अपनी चिंताओं को पीछे छोड़; ज्ञान के लिए जुट जाओ परिणाम अपने आप आयेंगे. मैं success का अपना मूल मंत्र आपसे share करना चाहता हूँ: "Desire + stability = Resolution. Resolution + Hard work = Success". मुझे पूरा विश्वास है की आप सभी देश के उज्वल भविष्य के लिए अपना योगदान देने में सक्षम है. पुनः मेरी ओर से शुभकामनाएं.
शिवेन्दु राय

Thursday, March 4, 2010

आदिवासी लड़कियों के साथ रोज़ एक शाइनी

छत्तीसगढ़ की नाबालिग लड़कियों को महानगरों में घरेलू नौकरानी का काम देने के झांसे से ले जाने के बाद उन्हें अंधेरी कोठरी में ढ़केल देने का खेल सालों से चल रहा है लेकिन शाइनी आहूजा प्रकरण से यह सवाल फिर खड़ा हो गया है. अगर जशपुर, सरगुजा और कोरबा के गांवों में आप जाएं तो आपको इन इलाकों से गायब आदिवासी लड़कियों के साथ हर रोज़ एक शाइनी के किस्से मिल जाएंगे.
इसे संयोग ही कहा जाएगा कि जिस समय शाइनी आहूजा प्रकरण चर्चा में था, उसी समय लड़कियों की मंडी के कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ के जशपुर में मुंबई पुलिस का एक दल बंधक बनाई गई लड़की को छोड़ने के लिए आया हुआ था.कुछ उत्साही पत्रकारों ने अपनी कल्पना शक्ति का सहारा लिया और छत्तीसगढ़ के अख़बारों में 19 मार्च को सुर्खियां रही कि मुम्बई के फिल्म स्टार शाइनी आहूजा ने जिस लड़की से बलात्कार किया, वह छत्तीसगढ के जशपुर जिसे के अंतर्गत आने वाले डूमरटोली गांव की रहने वाली है. जैसा कि जशपुर के पुलिस अधीक्षक अक़बर राम कोर्राम बताते हैं- “ शाइनी आहूजा प्रकरण के बाद मुम्बई से पुलिस की एक टीम डूमरटोली आई थी, लेकिन इसका शाइनी प्रकरण से कोई सम्बन्ध नहीं है. वह एक लड़की को मुम्बई से यहां छोड़ने पहुंची थी, जो पिछले 9 मार्च से गायब थी. इस लड़की का नाम गायत्री है और वह अपनी एक सहेली अनीमा के बहकावे में आकर मुम्बई चली गई थी.” अनीमा के कुछ परिचितों के ज़रिये गायत्री का पता चला और उसे डूमरटोली लाकर उनके परिजनों को सौंप दिया गया. लड़कियों को ट्रैफेकिंग से बचाने और उन्हें सीमित साधनों के बीच दिल्ली, मुम्बई, गोवा जैसे महानगरों से छुड़ाकर लाने वाली जशपुर की सामाजिक कार्यकर्ता एस्थेर खेस का कहना है कि शाइनी प्रकरण के बीच मुम्बई की पुलिस का जशपुर पहुंचने से यह फिर साफ़ हो गया है कि वहां बड़ी तादात में घरेलू नौकरानियों के रूप में काम करने वाली लड़कियां छत्तीसगढ़ से गई हुई हैं. हज़ारों शिकार सुश्री खेस कहती हैं कि शाइनी ने जिस लड़की को शिकार बनाया वह गायत्री तो नहीं है, लेकिन हमारे पास दर्जनों ऐसे मामले हैं जिनमें सबूत है कि जशपुर की लड़कियों को घरेलू काम कराने के बहाने से न केवल देश के भीतर बल्कि कुवैत और जापान तक ले जाए गए.
दिल्ली और गोवा जा पहुंची कई लड़कियों का सालों से पता नहीं है और उनके मां-बाप दलालों के दिए फोन नम्बर और पतों पर सम्पर्क नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि इनमें से ज़्यादातर फर्ज़ी हैं. लड़कियों को ले जाने के बाद प्लेसमेंट एंजेंसियों के दफ्तरों में फिर कोठियों में इन लड़कियों को 24 घंटे रखा जाता है. जब घर में पुरूष सदस्य अकेले होते है तो उनके साथ बलात्कार किया जाता है. इनको ठीक से भोजन, कपड़ा तक नहीं मिलता, इन्हें कोई छुट्टी नहीं मिलती. इनका वेतन दलालों के पास जमा कराया जाता है. लड़कियों को अपने घर लौटने का रास्ता पता नहीं होता इसलिये वे सारा ज़ुल्म चुपचाप सहती हैं. सुश्री खेस का यह भी कहना है कि दिल्ली में 150 से ज्यादा प्लेसमेंट एजेंसियां काम कर रही हैं जो झारखंड, पश्चिम बंगाल और उत्तर छत्तीसगढ़ से लड़कियों को बुलाते हैं. इनके एजेंट का काम इन लड़कियों के वे रिश्तेदार करते हैं, जो कई साल पहले से ही इन महानगरों में काम कर रहे होते हैं. नया ट्रैफेकिंग कानूनछत्तीसगढ़ महिला आयोग की अध्यक्ष विभा राव राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास के इस बयान से सहमत हैं कि गरीब नाबालिग लड़कियों को शोषण का शिकार होने से बचाया जाए. श्रीमती राव को यक़ीन है कि अब देशभर में घरेलू नौकरानियों की सुरक्षा को लेकर नई बहस छिड़ेगी. उनका कहना है कि इस समस्या से छत्तीसगढ़ सर्वाधिक प्रभावित राज्यों में से एक है, इसलिय़े वे चाहती हैं कि ट्रैफेकिंग को लेकर भी मौजूदा कानूनों की समीक्षा की जाए और इसे रोकने के लिए प्रावधान कड़े किए जाएं. श्रीमती राव ने शाइनी आहूजा प्रकरण में छ्त्तीसगढ़ की लड़की के शिकार होने की अफवाह के बाद जशपुर कलेक्टर और एस पी को पत्र लिखकर पूरे मामले का प्रतिवेदन देने के लिए भी कहा है. वास्तव में घरेलू नौकरानियों की सुरक्षा व ट्रैफेंकिंग रोकने के ख़िलाफ एक कानून पिछली सरकार में ही बन जाना था. तत्कालीन केन्द्रीय महिला बाल विका मंत्री रेणुका चौधरी ने जून 2007 तक इस कानून का ख़ाका तैयार करने के लिए देशभर में सक्रिय महिला संगठनों से सुझाव मांगा था. लेकिन प्रस्ताव भेजने के बाद क्या हुआ यह किसी को नहीं मालूम. ट्रैफेंकिंग के ख़िलाफ ही काम कर रहीं कुनकुरी की अधिवक्ता सिस्टर सेवती पन्ना का कहना है कि उनसे भी सुझाव मंगाए गए थे लेकिन उसका क्या हुआ उन्हें पता नहीं. इसमें उन्होंने महानगरों से छुड़ा कर लाई जाने वाली लड़कियों के पुनर्वास के लिए भी पुख़्ता उपाय सुझाए थे, क्योंकि देखा गया है कि महानगरों में रहकर लौटने वाली लड़कियां गांवों में व्यस्त न होने के चलते विचलित रहती हैं. वे यहां दुबारा घुल-मिल नहीं पाती और दुबारा महानगरों की तरफ भागने का रास्ता तलाश करती हैं.बहरहाल, शाइनी आहूजा प्रकरण ने एक मौका और दिया है कि छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल से तस्करी कर महानगरों में भेजी जा रही लड़कियों की सुरक्षा के लिए ज़रूरी कदम उठाएं जाएं.

Wednesday, February 17, 2010

Ii दलित साहित्य आन्दोलन का औचित्य ii

शिवेन्दु राय
यूं तो हिन्दी में दलित साहित्य की बुनियाद के तौर पर कबीर, दादू, रैदास, पीपा, सेन, रविदास आदि का नाम चिन्हित किया जा चुका है और दलित साहित्य के प्रणेता दलित साहित्य के संदर्भ में उन पर दलित दृष्टिकोण से अनुसंधान में लगे हुए हैं किन्तु आधुनिक दलित साहित्य की शुरुआत मराठी भाषा में रचित साहित्य से मानी जा रही है जिसकी प्रेरणा की पृष्ठभूमि में संतकवि नामदेव, चोखामिला, ज्ञानेश्वर, समर्थ रामदास, तुकाराम, एकनाथ आदि हैं।

आधुनिक दलित साहित्य आंदोलन ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले और डा. अम्बेडकर द्वारा चलाए गए सशक्त सामाजिक आंदोलन के परिणामस्वरूप उभरा है। ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले ने पहले पहल दलितों की खासतौर से दलित स्त्रियों की शिक्षा का आंदोलन चलाया। उन्होंने दलितों के उत्थान और सामाजिक सम्मान के लिए स्वयं पर अनेकानेक अत्याचार सहकर भी जागृति की एक लहर पैदा की। डा. अम्बेडकर ने उनके द्वारा तैयार जमीन पर व्यापक दलित चेतना के बीज बोये और परिणामस्वरूप, उनके जीवन काल में ही सशक्त सामाजिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक दलित आंदोलन अस्तित्व में आया। इस आंदोलन की जबरदस्त अभिव्यक्ति के रूप में भारतीय साहित्य के दृश्य पटल पर दलित साहित्य उपस्थित हुआ और सतह पर दिखाई पड़ने लगा। जल्द ही इसका प्रभाव हिंदी भाषा पर भी पड़ा। आज वर्तमान हिंदी साहित्य में दलित लेखन के उभार और उसके निरंतर विकास से इंकार नहीं किया जा सकता है। दलित साहित्य के इस जबरदस्त उभार ने भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों और आलोचकों में एक हलचल पैदा कर दी है जिससे उनका ध्यान इस ओर आकर्षित हुआ है। किन्तु इसके साथ ही यह भी सच है कि स्वयं दलित साहित्य आंदोलन और दलित रचनाकारों को वैचारिक स्तर पर अनेक अन्तरनिहित अन्तर्विरोधों का सामना भी करना पड़ रहा है।

जाति से दलित ही दलित साहित्यकार है

इस प्रस्थापना के अनुसार किसी साहित्यकार को दलित साहित्यकार होने के लिए यह अनिवार्य है कि वह दलित जाति में पैदा हुआ हो। किन्तु अभी भी यह मसला काफी बहस की गुंजाईश रखता है कि आखिर दलित कौन है? दलित साहित्य की मुख्यधारा के चिंतकों का मानना है कि दलित साहित्यकार वही है जो जाति से दलित है। वे दलित साहित्य को व्यापक अर्थों में न देखकर दलित जाति के संदर्भ में ही देखते हैं किन्तु वहां भी ‘दलित’ शब्द की व्याख्या को लेकर अस्पष्टता है। वे दलितों में उभर रहे अभिजातीय व शोषक वर्ग के उभार को दरकिनार ही करते आ रहे हैं किन्तु दलित साहित्य के चिंतकों की दूसरी धारा दलित शब्द के व्यापक अर्थ लगाती है। उनका मानना है कि किसी भी जाति या धर्म से संबंध रखने वाला व्यक्ति अगर सामाजिक और आर्थिक रूप से शोषित है तो उसे भी दलितों की एक श्रेणी के रूप में ही रेखांकित किया जाना चाहिए। आज दलितों में, खासतौर से कस्बों, नगरों और महानगरों में एक ऐसा वर्ग पैदा हो गया है जिसने गुणात्मक रूप से अच्छी सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में जन्म लेने के कारण जातीय उत्पीड़न को बिल्कुल नहीं झेला है। इस प्रकार का दलित अन्य अमीर तबकों की तरह न सिर्फ दलितों का दुश्मन साबित हो रहा है अपितु स्वयं दलितों में ही शोषकों की एक श्रेणी को संभव बना रहा है। वह वास्तव में सत्ता का दलाल है। ऐसा दलित अगर सभी दलितों की पीड़ा को जानने, समझने और महसूस करने का दावा करता है तो इसे दलित विमर्शकार ही तय करें कि यह कितना उचित है।

अगर इस अभिजातीय और शोषक दलित को दलित साहित्य का प्रणेता माना जा सकता है तो किसी अन्य जाति में पैदा हुआ दलितवादी जनवादी लेखक को क्यों नहीं? क्या उसे दलितों का समर्थक केवल इसलिए नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि उसने दलित जाति में जन्म नहीं लिया है। यही आधार गौतम बुद्ध के संदर्भ में भी इस्तेमाल किया जाना चाहिए। गौतम बुद्ध ने राजघराने में जन्म लिया और दलित जाति से उनका दूर-दूर तक नाता नहीं था। लेकिन अपने त्याग और दलितवादी चिंतन के आधार पर वे दलितों के मसीहा बने। गौतम बुद्ध ने सभी पीड़ितों को अपने दामन में पनाह दी और उनके विहारों में अन्य जातियों के गरीबों को भी बराबरी का दर्ज़ा मिला। इसके अतिरिक्त इन्हीं विहारों में राजा, सामंत और व्यापारी लोग भी आते रहे। दलितों के जीवन की विसंगतियों पर व्यापक चिंतन और सृजन करने वाले महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए किंतु उनके प्रति दलित विचारकों का नज़रिया काफी तंग है।

जाति के आधार के संदर्भ में उन दलितों का सवाल भी उठाया जा सकता है जो धर्मान्तरण करके अन्य धर्मों में जा चुके हैं। उन धर्मों में हिंदू धर्म के विपरीत वहां उन्हें सैद्धांतिक तौर पर जाति के आधार पर छुआछात या भेदभाव नहीं झेलना पड़ा है। जातीय उत्पीड़न से मुक्ति के दलितों ने अनेक मार्ग खोजे हैं जिनमें दूसरे धर्मों में धर्मातरण भी एक प्रचलित तरीका रहा है। बुद्ध धर्म के साम्यवादी स्वरूप ने पहले पहल दलितों को अपनी ओर आकर्षित किया और हजारों दलित बौद्ध बने। इसी प्रकार जैन, इस्लाम, ईसाई, सिख व आर्य समाज आदि धर्मों में दलित धर्मातरण करके जाते रहे हैं। ऐसे लोग जिस साहित्य का सृजन करेंगे उसे किस आधार पर दलित साहित्य माना जाएगा। क्योंकि न तो वहां मनुवादी वर्ण व्यवस्था है न जाति के आधार पर दलित उत्पीड़न।

इसके अतिरिक्त यहां एक सवाल और जरूरी लगता है भले ही उसकी संभावनाएं कम हों। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि हर प्रकार का साहित्य कर्म अपने बुनियादी रूप में शोषण विरोधी और व्यापक अर्थों में सत्ता विरोधी होता है। वह समाज में व्याप्त बुराइयों की आलोचना करता है और सुखद~ मानवीय परिस्थितियों वाले समाज के निर्माण के लिए लोगों में जागृति और चेतना का प्रसार करता है। इसे विपरीत समाज में जन विरोधी या प्रगतिशील मूल्य विरोधी और सत्तापक्षी साहित्य भी खूब रचा जाता है। मान लीजिए कोई दलित साहित्यकार सत्ता के समर्थन और दलितों के विरोध में रचना करे तब क्या ऐसे साहित्य को भी दलित साहित्य केवल इसलिए माना जाना चाहिए कि उसकी रचना एक दलित साहित्यकार ने की है।

इस संदर्भ में कहना यही है कि किसी दलित साहित्यकार के लिए दलित होने की शर्त तो ठीक है किंतु ऐसे मानदंडों का होना भी जरूरी है जिनसे यह तय किया जा सके कि उसकी कौन-सी रचना दलित साहित्य मानी जाएगी और कौन-सी नहीं?
दलितों द्वारा दलितों पर रचा गया साहित्य ही दलित साहित्य

एक पत्रिका ने अपने आगामी अंक में ‘दलित साहित्य’ विशेषांक निकालने की घोषणा की थी पिछले साल। मैंने उसमें अपनी एक कहानी भेज दी और जल्दी ही वह वापस भी आ गई क्योंकि न तो उस कहानी के पात्र दलित हैं और न उसकी विषय वस्तु दलित जीवन की विसंगतियों पर प्रकाश डालती है। अधिकांश दलित विमर्शकारों द्वारा यह बात उठाई जा रही है कि केवल दलितों द्वारा दलितों की जीवन परिस्थितियों पर लिखा गया साहित्य ही दलित साहित्य है। यह एक संकीर्ण और अन्तर्विरोधी प्रस्थापना है। दलितों द्वारा लिखे जाने की बात तो ठीक है मगर उनका केवल दलित जीवन पर लिखने की शर्त दलित साहित्य को केवल दलित समाज और दलित उत्पीड़न के चित्रण के दायरे में कैद करने की भूल है। इससे दलित साहित्य न सिर्फ वैचारिक न सृजनात्मक स्तर पर सीमित होगा बल्कि उसका विकास भी कुंद होगा।

इस संदर्भ में संत कबीर, नामदेव, पीपा, रैदास, ज्ञानदेव, तुकाराम और एकानाथ आदि का साहित्य देखा जा सकता है। उनके जमाने में सामंतवादी व्यवस्था काफी मजबूत थी और वर्ण व्यवस्था भी। ये लोग केवल इसलिए महान कवि नहीं माने जाएंगे कि उन्होंने दलित जीवन का अपने काव्य में व्यापक चित्रण किया बल्कि वे इसलिए बड़े और महान कवि हैं कि उन्होंने पूरे समाज में व्याप्त बुराइयों और शोषणकारी व्यवस्था के विरोध में जीवन भर सशक्त सृजनकर्म किया। दलित वर्ग में जन्म लेने के बावजूद कबीर साहित्य में इक्का-दुक्का प्रसंगों के अलावा न तो दलित पात्र आते हैं और न दलित जीवन की विडम्बनाओं का ज़िक्र आता है बल्कि पूरे समाज में व्याप्त धार्मिक कटटरता, अंधविश्वास व रुढ़ियां ही उन्हें ज्यादा परेशान करती हैं। अपने संपूर्ण काव्य में वे उन्हीं पर क्रांतिकारी ढंग से प्रहार करते नजर आते हैं। फिर उपरोक्त प्रस्थापना के आधार पर उन्हें दलित साहित्य की बुनियाद कैसे माना जा सकता है?

इसके विपरीत दलित वर्ग में जन्म न लेने के बावजूद प्रेमचंद ने अपने निजी अनुभव और मानवीय संवेदना के आधार पर अपने साहित्य में न सिर्फ दलित पीड़ा का गहन चित्रण किया है बल्कि उन पर सदियों से जुल्मों-सितम की बरसात करने वाली ब्राह्मणवादी-सामंतवादी शक्तियों का न सिर्फ भंडाफोड़ किया है बल्कि उन्हें जनविरोधी साबित करते हुए उन पर निर्ममता से प्रहार भी किए हैं। याद कीजिए उनके दलितवादी होने के कारण ही हिंदी साहित्य सम्मेलन ने उन पर तमाम आरोप लगाए थे। केवल ‘कफन’ कहानी (उसको भी संकीर्ण दृष्टिकोण से परखकर) को लेकर हो हल्ला मचाने वाले दलित आलोचकों को दलित पात्रों को लेकर रची गई उनकी अन्य रचनाएं भी पढ़नी चाहिए और उन पर यथार्थवादी ढंग से विचार करना चाहिए। यह कोई सार्वभौमिक सत्य नहीं है कि दलित की पीड़ा को दलित ही जानता है और वही इसकी सही अभिव्यक्ति कर सकता है। भले ही वह दलित साहित्य हो। किसी भी उत्कृष्ट रचना के लिए केवल अनुभव ही काफी नहीं होता उसके लिए अपने समय और समाज की परिपक्व समझ, व्यापक दृष्टि, गहन मानवीय संवेदना और विलक्षण रचना शक्ति की भी आवश्यकता होती है।

फिर सवाल ये उठता है कि दलित साहित्यकार अपने रचनाकर्म को केवल जातीय शोषण तक ही क्यों सीमित करे। आज समाज में जाति के अलावा भी ऐसी सैंकड़ों समस्याएं हैं जिनसे दलितों को भी दो-चार होना पड़ रहा है। क्यों गरीबी, भुखमरी, बेकारी, भ्रष्टाचार और मंहगाई किसी दलित रचनाकार के रचनाकर्म का विषय नहीं हो सकते। क्या इन समस्याओं के चलते दलित समाज के अन्य उत्पीड़ितों से नहीं जुड़ते? क्यों एक दलित साहित्यकार अन्य उपेक्षितों की पीड़ा का चित्रण अपनी रचनाओं में नहीं कर सकता? क्यों एक दलित साहित्यकार बिना जातिगत संदर्भ दिए जो लिखे वह दलित साहित्य नहीं माना जाना चाहिए? दलित साहित्यकार क्यों समूचे आकाश पर नहीं लिख सकता है? उसके लेखन और दृष्टि को केवल जाति की सीमाओं में कैद करने वाले क्या वास्तव में दलित साहित्य के आंदोलन को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

दलितों द्वारा दलितों के जीवन पर दलितों के लिए रचा गया साहित्य

दलितों में साहित्य का व्यापक प्रचार-प्रसार होने से उनमें सांस्कृतिक रूझान पैदा होगा और चेतना बुद्धि का विकास होगा। किन्तु यह कहना जितना आसान है, इसे कार्यरूप देना उतना ही कठिन है। इस समस्या का सामना जनवादी सांस्कृतिक कर्मियों को भी करना पड़ रहा है। दलित भी इससे अछूते नहीं है। उन्हें सांस्कृतिक क्षेत्र में आई जड़ता को तोड़ने के लिए व्यापक पैमाने पर कदम उठाने पड़ेंगे। पहले तो इसके लिए उन्हें दलितों में शिक्षा के व्यापक प्रसार की दिशा में काम करना पड़ेगा। अपने लेखन के दलितों में शिक्षा के व्यापक प्रसार की दिशा में काम करना पड़ेगा। अपने लेखन के दलितों में प्रसार के लिए विभिन्न सृजनात्मक तरीके इस्तेमाल करते हुए लोगों के बीच जाना पड़ेगा। दलित विचार और साहित्य संबंधी पत्र-पत्रिकाएं व्यापक पैमाने पर निकालनी होंगी। मुख्यधारा से अलग दलित साहित्य प्रकाशन की अपनी व्यवस्थाएं कायम करनी होंगी।

बहरहाल, उपरोक्त प्रस्थापना में दलित साहित्य के प्रचार-प्रसार व पठन-पाठन को दलितों तक सीमित करने का अर्थ निकलता है। यह न तो दलित साहित्य के हित में है और न दलितों के। दलित वृहत्तर समाज का अंग है। सदियों से जातिगत अपमान व भेद-भाव की जो पीड़ा दलितों ने झेली है उससे समाज के अन्य वगो± को भी परिचित होना चाहिए। दलित वर्ग तो उससे एक हद तक वाकिफ है ही। ‘केवल दलितों के लिए’ की चेपी लगाकर भी किसी दलित रचना को अन्य वगो± द्वारा पढ़े जाने से नहीं रोका जा सकता है बल्कि दलित साहित्य के व्यापक आधार के निर्माण के लिए यह जरूरी भी है कि वह समाज के अन्य वगो± तक भी पहुंचे। इससे दलित आंदोलन को दूसरे वगो± में अपने सहानुभूतिक और समर्थक मिलेंगे। दूसरे तबकों में दलित साहित्य के प्रचार-प्रसार से उसकी विवेकशीलता व गzहणशीलता बढ़ेगी व समाज के अन्य उत्पीड़ित वगो± से एकता का रास्ता खुलेगा।

दोस्त और दुश्मन की पहचान

अब इस सवाल को और नहीं टाला जा सकता है। इस सवाल पर उथले-पुथले ढंग से बहसबाजी करने के बजाए ज्यादा गहराई और व्यापकता के साथ चिंतन मनन करने की जरूरत है। अभी तक हिंदी के दलित साहित्यकार दलितों के शत्रु के रूप में ब्राह्मणवादी-सामंतवादी शक्तियों के रूप में चिन्हित कर रहे हैं। दलित विमर्श और चिंतन का यह काफी कमजोर पहलू है। इस तरफ दलित विमर्शकारों की तरफ से न तो कोई खास चिंतन हुआ है और न उनकी तरफ से सशक्त अनुसंधान ही सामने आए हैं। अधिकतर भारतीय इतिहासकारों और अर्थवेत्ताओं की इस सवाल पर अब सहमति दिखाई देती है कि भारत में न तो ब्राह्मणवादी शक्तियां मजबूत रह गई हैं और न सामंतवादी शक्तियां। इसके विपरीत भारतीय शासक वर्ग और शासन व्यवस्था पूंजीवादी शक्तियों द्वारा संचालित है। जो पिछले पचास सालों में देश को पूंजीवादी विकास के रास्ते पर काफी आगे ले आई हैं और समाज में इसका व्यापक प्रभाव दिखाई पड़ रहा है।

इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि जाति भारतीय समाज की एक कटु सच्चाई रही है और वह अब भी भले सामंतवादी विकृत मानसिकता के रूप में समाज में उपस्थित है। इसमें भी संदेह नहीं है कि वर्णव्यवस्था के कारण ही सामाजिक-आर्थिक दासता दलितों को विरासत के रूप में मिली है। जिसे वे सदियों से झेलते आ रहे हैं और आज भी किसी न किसी रूप में झेल रहे हैं। दलितों को सामाजिक सम्मान और बराबरी की बजाय जितनी घृणा और जिल्लत मिली है उससे कोई इंकार नहीं कर सकता है। किंतु आज भारतीय समाज विकास के जिस मुकाम पर खड़ा है वहां सामंतवादी शक्तियों और दलित शोषण के उनके हथियार काफी कमजोर पड़ रहे हैं। दलित विमर्शकारों को अपने दोस्तों और दुश्मनों की पहचान इसी संदर्भ में करनी चाहिए।

आजाद भारत की बागडोर बहुमत से पूंजीवादी ताकतों के हाथ में आई। सामंतवादी शक्तियां पूंजीवादी विकास के रास्ते में रुकावट थीं क्योंकि बिना उनको कमजोर किए देश को पूंजीवादी विकास के रास्ते पर नहीं ले जाया जा सकता था। अत: पूंजीवादी शासक वर्ग ने भूमि सुधार आदि कार्यक्रमों के जरिए उन पर आक्रमण किए किन्तु उनका जड़मूल से विनाश ना करके उसे अपना सहयोगी बना लिया। अत: यदाकदा सामंतवादी शक्तियों द्वारा दलितों पर अमानवीय हमलों की जो घटनाएं सामने आती हैं वह इन्हीं सामंतवादी अवशेषों द्वारा की जाती हैं जिन्हें वो समाज में अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए सरंजाम देते हैं।

पूंजीवादी विकास की दिशा में देश को ले जाने वाले शासकों ने विभिन्न कानूनों और संस्थाओं के जरिए दलितों और पिछड़ों के अधिकारों को कायम करने और उन्हें सुरक्षित रखने के प्रयास किए हैं। भारत के जनवादी आंदोलन व मजबूत दलित आंदोलन के दबावों के चलते वे ऐसा करने के लिए मजबूर हुए हैं। दलित आंदोलन के बढ़ते प्रभाव के परिणामस्वरूप संविधान में दलितों के लिए शिक्षा, रोजगार आदि मुहैया कराने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई जिससे दलितों को सामाजिक और आर्थिक स्थिति में काफी सुधार आया है हालांकि यह अभी भी कई मायनों में नाकाफी है। चाहे जो हो, आजाद भारत में दलितों की स्थिति काफी सुधरी है।
इसमें संदेह नहीं कि वर्णव्यवस्था पर चोट करके सामाजिक सम्मान हासिल करने की ओर बढ़ा जा सकता है परन्तु इसे ही आर्थिक विषमता का निदान समझना भयानक मूर्खता है। डाW. अम्बेडकर का भी मत था कि दलितों के सामाजिक सम्मान के लिए वर्णव्यवस्था का खात्मा लाज़मी है किन्तु इसमें लड़ाई अधूरी ही रहेगी अगर दलितों में उपस्थित आर्थिक निम्नता और अभाव को समाप्त नहीं किया जाता है। इसको खत्म किए बिना न तो दलितों को सामाजिक सम्मान मिल सकता है और न सच्चे लोकतंत्र की स्थापना की जा सकती है।

आज का अधिकांश दलित जातिगत विपन्नता और आर्थिक विषमता का शिकार है। दलितों में आर्थिक अभाव इतना ज्यादा है कि कुछ सेर गेहूं या कुछ रुपयों के लालच में वे अपना स्वाभिमान तक बेच डालते हैं और जनतंत्र की स्थापना में अपनी निर्णायक भूमिका को धनिकों को सौंप देते हैं। देश में पूंजीवादी शासकवर्ग ने नित नई जनविरोधी नीतियां बनाकर दलितों, पिछड़ों और पिछड़ों की हालत बद से बदतर कर दी है। आज समाज में गरीबी, बेरोजगारी और भुखमरी बड़े पैमाने पर फैल रही है। सरकारें, चाहे किसी भी पार्टी की हों, वे जन स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं से लगातार कटौती कर रही हैं! महंगाई ने गरीबों की कमर तोड़ डाली है। चारों तरफ निजीकरण का बोलबाला है। सरकारी नौकरियां इतनी कम की जा रही हैं कि उनमें आरक्षण का कोई मतलब ही नहीं रह गया है। गरीबों को विकास के नाम पर हर जगह ठोकर मारी जा रही है। शहरों की ओर ढकेलता है जहां वे अमानवीय परिस्थितियों में जीवन गुजारने को विवश होते हैं। शहरों में नित नई तकनीकें मजदूरों को कारखानों में मिलने वाले रोजगार से बाहर कर देती हैं।

इन हालातों का सबसे ज्यादा शिकार दलित वर्ग ही है। दलितों के सामने आज जाति के अलावा गरीबी, अशिक्षा, भूमिहीनता, महंगाई और बेरोजगारी जैसी समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं जिनका भौतिक आधार इस व्यवस्था में निहित है। सो, केवल ब्राह्मणवादी शक्तियों को अपना शत्रु बताना दलितों के लिए काफी नहीं है। पूंजीवादी-नव साम्राज्यवादी व्यवस्था ताकतवर दुश्मन के रूप में उनके सामने मुंह बाये खड़ी है जिसका आकलन दलित आंदोलन के लिए एकदम अनिवार्य है। पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजी और श्रम के स्थायी अन्तविरोध के कारण उनका दोस्ताना संबंध सर्वहारा संघर्ष से बनना दलित आंदोलन को व्यापक बनाएगा। सम्पूर्ण समाज की मुक्ति के आंदोलन में ही दलित आंदोलन की सार्थकता होगी उससे अलग होकर नहीं।


विचारधारा का सवाल

विचारधारा के सवाल पर अधिकतर दलित चिंतक ये बयान देते हैं कि उनका जुड़ाव केवल अम्बेडकरवादी विचारधारा से ही हो सकता है किसी अन्य विचारधारा से नहीं। ऐसा करते वक्त वे अम्बेडकरवादी विचारधारा की सीमाओं की चर्चा नहीं करते हैं। डा. अम्बेडकर ने अपने अथक प्रयासों से दलितों में सामाजिक सम्मान का आंदोलन खड़ा किया किन्तु 1951 तक आते-आते उन्हें इस बात का अहसास हो चला था कि केवल जाति अवस्था के खात्मे से दलितों का खात्मा नहीं होगा बल्कि आर्थिक विषमता के दुर्ग को भी तोड़ना होगा। इसलिए उन्होंने आर्थिक समाजवाद का सपना देखना शुरू किया। इस दिशा में वे चिंतन मनन कर ही रहे थे कि उनकी मृत्यु हो गई। रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया की स्थापना को इसी अर्थ में देखा जाना चाहिए। किंतु बाद में आर. पी. आई उनके आर्थिक समाजवाद को साकार करने के रास्ते पर नहीं बढ़ी। बसपा आदि दलितवादी पार्टियों के अजंडे पर भी आर्थिक समाजवाद लाने का सपना नहीं है। बसपा भी आज सत्ता के जिस खेल में शामिल हो चुकी है वहां उसके लिए अम्बेडकरवादी विचारधारा केवल दिखावा है।
आजाद भारत में अम्बेडकर न सिर्फ कांग्रेसी नीतियों की आलोचना करते रहे बल्कि तत्कालीन कम्युनिस्ट पार्टी और उसके व्यवहार को दलित आंदोलन की मजबूती का आधार नहीं माना। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि वे वामपंथी विचारों के विरोधी थे बल्कि उनकी चर्चित पुस्तक ‘स्टेट एंड माइनोरिटि’ पर वामपंथी विचारों की छाप मिलती है।

1952 के आम चुनावों में अच्छी जीत हासिल करके कम्युनिस्ट पार्टी संसदीय रास्ते से समाज बदलाव की हामी बनती गई। डा. अम्बेडकर ने उसके इस रुख को अच्छी तरह से चिन्हित किया था। उनको लगता था कि वामपंथी दलित समस्या को समाज की कोई समस्या न मानकर उससे न सिर्फ आंख मींचे है बल्कि वामपंथी दृष्टिकोण से दलित समस्या का समाधान खोजने में असमर्थ साबित हो रहे हैं।

आज ऐसे दलित चिंतकों की कमी नहीं है जो अम्बेडकर को लगातार वामपंथी विचारधारा के विरोध में खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। इसमें कुछ योगदान उन तथाकथित वामपंथियों का भी है जो न मार्क्सवाद को भारतीय संदर्भ में ढाल पाते हैं और न उसे व्यवहार में उतार पाते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि अब तक वामपंथ उन ऊंची जात वालों का खिलौना बनता रहा है जो न मार्क्सवाद को ठीक से जीवन में उतार पाए और न अपनी जातीय स्थिति का त्याग कर पाए। यह उन्हीं की दोहरी भूमिका का नतीजा है कि वामपंथ आज छ्दम वामपंथ बन गया है। लेकिन खाली छदम वामपंथ का विरोध करने भर से काम नहीं चलने वाला है। दलितों को चाहिए कि वे न सिर्फ वामपंथी विचारधारा बल्कि अन्य वैज्ञानिक विचारधाराओं का भी गहन अध्ययन करें और उसे अंबेडकरवादी विचारधारा के विकास का माध्यम बनाएं। इससे उन्हें न सिर्फ छद~म वामपंथ से मुक्ति मिलेगी बल्कि वैचारिक स्तर पर दलित आंदोलन की व्यापकता बढ़ेगी।
दलितों का उत्पीड़न समाज के अन्य शोषितों के उत्पीड़न से भिन्न अवश्य हो सकता है किंतु उससे अलग नहीं हो सकता है। जाति के अलावा उनके सामने अनेक समस्याएं हैं जिन पर संघर्ष लाजमी बनता है। इस आधार पर दलितों का संघर्ष अन्य शोषितों के संघर्ष से जुड़ता है। अस्तु, दलित साहित्य आंदोलन का संबंध जनवादी साहित्य आंदोलन से बनता है।

दलितों की पीड़ा को एक वास्तविक दलित ही समझ सकता है किंतु मानवीय संवेदना और जनवादी समझ के आधार पर अन्य वर्गों के साहित्यकार भी इसे समझ और व्यक्त कर सकते हैं। अत: दलितों द्वारा रचित साहित्य को तो दलित साहित्य माना ही जाना चाहिए किंतु जनवादी लेखकों द्वारा दलित जीवन पर रचित साहित्य को भी दलित साहित्य का एक हिस्सा माना जाना चाहिए।

दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्रा अभी निर्माण की प्रक्रिया में है लेकिन उसको परखने के आधार भी वही होने चाहिए जो दुनिया के किसी भी उत्पीड़ितों के साहित्य को समझने के होंगे। इसे केवल जातीय उत्पीड़न और दलितों तक ही सीमित नहीं करना चाहिए बल्कि समाज में व्याप्त अन्य जनसमस्याओं पर भी दलितों को सोचना और रचना चाहिए। दलित साहित्य इस प्रकार वृहत~ समाज के उत्पीड़ितों के बीच भी उपयोगी हो सकता है इसलिए उनके बीच भी इसका प्रसार होना चाहिए।

अंत में, सिर्फ इतना ही कहना है कि भारतीय संदर्भों में दलित साहित्य न केवल छदमवामपंथ, जातीय उत्पीड़न, आर्थिक उत्पीड़न से मुक्ति का वैचारिक स्रोत है बल्कि जनवादी व प्रगतिशील साहित्य के फलक की व्यापकता का आधार भी है। दलित साहित्य मुक्तिकामी साहित्य है और ये समस्त वर्गों के उत्पीड़ितों के साहित्य का हिस्सा होकर ही अपनी क्रांतिकारी भूमिका को सरंजाम दे सकता है।