अपने अधिकारों का जान उनकी रक्षा करना है वीरता ज़ुल्मों को ना सहना पापी के आगे ना झुकना है वीरता देश की सीमा पे दुश्मन से लेना लोहा है वीरता जो सच है उसको ही कहना सच के सिवा कुछ ना कहना है वीरता सच के लिए लड़ना सच को साबित करना है वीरता अपनों की हर पल रक्षा करना है वीरता मासूम अबला की हिफाज़त करना है वीरता हर पल सिर को ऊँचा रखना केवल प्यार में झुकना है वीरता
hum hia jee
Friday, September 14, 2012
जिज्ञासा(JIGYASA) : राष्ट्रीय जलनीति -2012
Wednesday, March 7, 2012
Thursday, December 1, 2011
SCIENCE AND TECHNOLOGY: अग्नि 1 मिसाइल का परीक्षण .....
Wednesday, April 13, 2011
Tuesday, April 12, 2011
Monday, March 14, 2011
Thursday, December 23, 2010
भीड़ ....
भीड़ अच्छी बात हो सकती है पर इसे नियंत्रित किया जाय तो ...प्रशिक्षित किया जाय तो ,पर ऐसा नहीं है, यह और बेतरतीब ढंग से बढती ही जा रही है .कुछ सियासी लोगों के लिए संजीवनी ही है .भीड़ में गुणवता लाने की कोशिश नहीं हो रही ,इसे बोझ बताने का चलन बढ़ रहा है . सरकार इसे अपनी नाकामी का बहाना बना रही है .
आगे भीड़ और बढ़ेगी ही ..तब बहाना बनाने वालो पर यह भारी साबित होगी . आपाधापी में जो आज कुछ चंद लोग जो घी पी रहे है ..कल उनके मुंह से यह भीड़ घी छीन कर पी जायेगी ...तब व्यवस्था का दोष देना मुर्खता की बात होगी . आज ही चेत ले इससे सुन्दर कुछ नहीं होगा .
Tuesday, November 30, 2010
खाद्य सुरक्षा...
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी भारत यात्रा के दौरान इस तथ्य को रेखांकित किया कि देश की 50 प्रतिशत आबादी 30 साल से कम आयु की है.
उनके अनुसार अगर हम खेती-बाड़ी को युवा पीढ़ी के लिए अधिक आकर्षक बनाते हुए इस जनसांख्यिकी लाभ को भुना सके तो और अच्छे परिणाम आ सकते हैं.उन्होंने कहा कि एग्री क्लिनिक तथा एग्री बिजनेस सेंटर जैसे संस्थानों में निकटवर्ती क्षेत्र से ही लोग होने चाहिए.इस काम के लिए खेती को लाभप्रद बनाना होगा .जिससे की युवाओं को कृषि की तरफ आकर्षित किया जा सके .उन्होंने द्वितीय हरित क्रांति पर भी जोर दिया जिसके बिना खाद्य सुरक्षा को हासिल नहीं किया जा सकता है .
Sunday, September 5, 2010
मैना की कहानी हो जाएगी पुरानी !


पहाड़ी मैना अब शायद किस्से कहानियों में ही सिमटकर रह जाएगी. नक्सलवाद और सुरक्षाबलों के बीच चल रहे युद्ध में अगर कोई ख़त्म हो रहा है तो वो है मैना.
बारूदी सुरंगों के विस्फोट की आवाजें, बंदूकों की तडतड़ाहट के बीच छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग की एक बड़ी प्यारी आवाज़ ग़ायब होती जा रही है.
यह आवाज़ है बस्तर की मैना की, जो दक्षिण छत्तीसगढ़ के इलाक़े में बड़ी संख्या में पाई जाती है. लेकिन क़रीब एक दशक से इस इलाक़े में पनप रहे नक्सलवाद, माओवादी छापामारों और सुरक्षा बलों के बीच चल रहे युद्ध की वजह से यह इलाक़ा पूरी तरह अशांत हो गया है.
इस अशांति का असर बस्तर के जंगलों पर भी पड़ा है. चाहे यहाँ राष्ट्रीय उद्यान हों या फिर इस क्षेत्र में रहने वाले लोग, पशु हों या पक्षी, सभी की जीवन बेचैन हो गया है.
यहां की बदलती हुई आब-ओ-हवा के कारण इस प्यारी सी चिड़िया ने प्रजनन करना लगभग बंद ही कर दिया है. यही वजह है कि इनकी आबादी दिन ब दिन घटती ही जा रही है.
बस्तर की मैना छत्तीसगढ़ की राजकीय पक्षी है इसलिए अब सरकार ने इसे संरक्षित करने के लिए एक कार्य योजना बनाई है. हालांकि संरक्षण का काम कई सालों से चल रहा था लेकिन इसके परिणाम वैसे नहीं आए जैसी उम्मीद की जा रही थी.
बस्तर के ज़िला मुख्यालय जगदलपुर के पास स्थित वन विद्यालय में पचास फीट लंबा और उतना ही चौड़ा एक विशालकाय पिंजरा है जिसमें दो मेहमान रहते हैं. एक है पायल और दूसरी नंदी.
पायल और नंदी का सारा वक़्त उनसे मिलने आए लोगों का मनोरंजन करने में ही बीत जाता है. बस्तर की मैना कि ख़ास बात है कि थोड़े से प्रशिक्षण के बाद वो बिलकुल इंसानों की आवाज़ की हू-ब-हू नक़ल कर सकती है.
पायल और नंदी के प्रशिक्षक हेमंत बेहेरा ने पायल को ख़ूब अच्छी बातें सिखाई हैं. मसलन, जैसे ही कोई पिंजरे के पास पहुँचता है तो एक इंसानी आवाज़ आती है जो कहती है "साहब नमस्ते".
इंसान जैसी आवाज़ अचानक चिड़िया के कंठ से किसी को भी चौंका देती है. कुछ देर बाद ये मैना फिर बोलती है, इस बार शब्द होते हैं "सीता राम. सीता राम. इतना ही नहीं, एक अच्छे दोस्त की तरह पूछती है "खाना खाए?"
इन दोनों मैनाओं को जंगलों से लाकर इस बड़े से पिंजरे में रखा गया है ताकि इनका संरक्षित प्रजनन हो सके. मगर इन कोशिशों के बावजूद पिछले दस सालों में कोई सफलता हासिल नहीं हो पाई है.
क्यों हो रही हैं ग़ायब?
आख़िर इसका क्या कारण है. बस्तर के वन संरक्षक अरुण पांडे कहते हैं, " बस्तर की मैना एक शर्मीली चिड़िया है जो सिर्फ़ बहुत ऊँचे पेड़ों पर रहना पसंद करती है. यह मैना शायद ही कभी नीचे आती है."
बस्तर की मैना की दूसरी बड़ी ख़ासियत है उसकी अपने साथी के लिए वफादारी. जिस साथी से एक बार प्रजनन किया फिर वो कभी दूसरे साथी के साथ प्रजनन नहीं कर सकती. अरुण पांडे के अनुसार इनकी घटती आबादी का एक ये भी बड़ा कारण है.
पिछले 15 सालों में जगदलपुर वन विद्यालय के पिंजरे में किसी मैना ने कोई अंडा तक नहीं दिया है जबकि पायल नाम की मैना नौ साल की है और नंदी तीन साल की.
वहीं राज्य के वन मंत्री विक्रम उसेंडी का कहना है कि बस्तर कि मैना को संरक्षित करने के लिए अब थाईलैंड के राम्खन हेम यूनिवर्सिटी में जीव विज्ञान के विशेषज्ञों से मदद मांगी गई है.
संभावना है कि अगले महीने विशेषज्ञों का एक दल बस्तर आएगा और जगदलपुर के वन विद्यालय के पिंजरे में रखी पायल और नंदी पर शोध भी करेगा.
अशांत मैना
इसके अलावा उसेंडी का मानना है कि पिछले कई सालों के अनुभव के बाद ये समझ में आता है कि शहर के बीच बसा वन विद्यालय इन पक्षियों के संरक्षण की सही जगह नहीं है क्योंकि यहां या तो आते जाते वाहनों का शोर रहता है या फिर पास से गुज़रने वाली रेल गाड़ी का.
उसेंडी कहते हैं, "इसलिए मैंने अपने विभाग के अधिकारियों से कहा है कि कांकेर घाटी के जंगलों में ही पिंजरे को स्थानांतरित कर दिया जाए ताकि बस्तर की मैना को प्राकृतिक परिवेश मिल पाए और उसके प्रजनन में बाधा न पैदा हो सके. बहुत जल्द ही ऐसा हो जाएगा."
पिछले दस सालों में छत्तीसगढ़ की सरकार नें बस्तर कि मैना को संरक्षित करने के लिए काफी़ पैसा ख़र्च किया है. मगर इन सब के बावजूद अब तक यह पता नहीं चल पाया है कि जगदलपुर वन विद्यालय के पिंजरे में रह रही दो मैनाओं में से कौन सा नर है और कौन सी मादा.
बहरहाल यह उम्मीद की जा रही है कि थाईलैंड के विशेषज्ञों के शोध के बाद बस्तर की मैना को संरक्षित करने में काफी़ मदद मिल सकती है.
बंधक बनाने वालों से कैसी बातचीत?
बीस साल पहले तत्कालीन गृहमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद को विदेशी /कश्मीरी चरमपंथियों के चंगुल से छुड़वाने का मामला हो या फिर इंडियन एअरलाइंस के विमान को छुड़वाने के लिए कश्मीरी चरमपंथियों की रिहाई का मामला हो भारत सरकार के पास बंधक-संकट से निपटने के लिए कोई ठोस नीति नहीं है.
हालाँकि यासिर अराफ़ात से लेकर काँग्रेस समर्थक पाँडे बंधु तक विमान अपहरण करके अपनी माँगे मनवाने की कोशिश कर चुके हैं. और अब बिहार में माओवादियों ने चार पुलिस वालों को बंधक बनाया हुआ था जिसमे से एक की ह्त्या भी कर दी गयी है
तो क्या बंधकों को बचाने के लिए सरकार को बंधक बनाने वालों से बातचीत करनी चाहिए या नहीं?
Wednesday, September 1, 2010
मीडियाकर्मी बनाने की दुकान !
इसी साल देश के सर्वोच्चतम माने जाने वाले मीडिया इंस्टीट्यूट भारतीय जनसंचार संस्थान को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा दे दिया गया। इसी तरह दिल्ली के पांच कॉलेजों- लेडी श्रीराम, कमला नेहरू, अग्रसेन, दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड कॉमर्स, कालिंदी कॉलेज में अंग्रेजी में पत्रकारिता को स्नातक स्तर पर पढ़ाया जा रहा है और हिंदी में चार कॉलेजों अदिति महाविद्यालय, भीमराव आंबेडकर कालेज, राम लाल आनंद, गुरुनानक देव खालसा कॉलेज में पत्रकारिता के स्नातक स्तर की पढ़ाई हो रही है।
यानी दिल्ली में मीडिया के अध्ययन का भरपूर माहौल तैयार हो चुका है और सरकारी कोशिशें भी काफी हद तक संतोषजनक ही रही हैं। इसके बावजूद दिल्ली में निजी संस्थानों भी एक के बाद एक खुलते गए हैं। दिल्ली से सटे एनसीआर क्षेत्र में पत्रकारिता की कई दुकानें खुली हैं और उनमें से ज्यादातर ने कहीं न कहीं दिल्ली विश्वविद्यालय के पत्रकारिता के पाठ्यक्रम से ही बड़े सबक उठाए हैं। सरकारी कॉलेजों की तुलना में इनमें से कुछ भले ही दर्शनीय और आकर्षक ज्यादा हों, लेकिन गुणवत्ता के मामले में ये खुद को साबित नहीं कर पाए हैं।
दरअसल, भारत में मीडिया शिक्षण मोटे तौर पर छह स्तरों पर होता है- सरकारी विश्वविद्यालयों या कॉलेजों में विश्वविद्यालयों से संबद्ध संस्थानों में, भारत सरकार के स्वायत्तता प्राप्त संस्थानों में पूरी तरह से निजी संस्थानों में, डीम्ड विश्वविद्यालयों में और किसी निजी चैनल या समाचारपत्र के खोले गए अपने मीडिया संस्थान में।
इनमें सबसे कम दावे सरकारी संस्थान करते हैं और दावों की होड़ में जीतते हैं निजी संस्थान। लेकिन विश्वसनीयता के मामले में बात एकदम उल्टी है। अब भारत में 125 डीम्ड विश्वविद्यालय खुल गए हैं। इनमें से 102 निजी स्वामित्व वाले संस्थान हैं। यहां भी शिक्षण संबंधी मूलभूत नियमों की अनदेखी की शिकायतें आती रही हैं। यही वजह है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय का कार्यभार संभालते ही कपिल सिब्बल ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा हासिल कर चुके सभी शिक्षण संस्थानों के कामकाज की समीक्षा के आदेश दे दिए।
उधर निजी चैनलों के कुछ संस्थान पहले तो चयन ही ऐसे छात्रों का करते हैं जो उनके चैनल के लिए पूरी तरह से उपयुक्त दिखते हों। इनमें ऊंची पहुंच वालों के बच्चों को तरजीह मिलती है। इनमें से कई संस्थान जो सर्टिफिकेट देते हैं, वह चैनल में तो चलता है लेकिन कहीं और नहीं। यहां किसी विश्वविद्यालय से संबद्ध डिग्री देने का प्रावधान नहीं होता है।
मसला यह भी है कि इन संस्थानों में पढ़ाता कौन है (क्या पढ़ाया जाता है, यह एक अलग मसला है)। सरकारी संस्थानों में इस साल से यूजीसी के निर्देशों का पालन अनिवार्य कर दिया गया है, यानी इन संस्थानों में अब वही शिक्षक नौकरी पा सकेंगे जो गुणवत्ता के स्तर पर कहीं से भी कम नहीं होंगे, क्योंकि नेट की परीक्षा को पार करना आसान नहीं।
ऐसे में अक्सर गेस्ट फैकल्टी को बुलाने की कोशिश होती है। ज्यादातर सरकारी कॉलेजों में आज भी अतिथि वक्ता को एक घंटे के लेक्चर के लिए 500 से 750 रुपए ही दिए जाते हैं। ऐसे में या तो लोग आते नहीं और अगर आ भी जाते हैं तो शिक्षण में अनुभवहीनता और अरुचि के चलते अपनी सफलता के किस्से सुनाकर चलते बनते हैं।
निजी संस्थानों में अब भी नेट अनिवार्य नहीं दिखती। नतीजा यह हुआ है कि या तो उनके पास वही शिक्षक रह जाते हैं जिनकी जानकारी अस्सी के दशक से आगे नहीं बढ़ी है अथवा वे जो मीडिया में हैं लेकिन पढ़ाने की कला नहीं जानते। ऐसे लोग कक्षाओं में किस्सागोई तो कर लेते हैं, लेकिन छात्रों के ज्ञान को विस्तार नहीं दे पाते।
ऐसे में मीडिया शिक्षा सिर खुजलाती दिखती है। युवा पत्रकार बनना चाहते हैं, वह भी जल्दी में। ऐसे में पत्रकारिता करना मैगी नूडल्स बनाने जैसा काम हो गई है। बाद में पता चलता है कि जल्दी में जिस फसल को रातोंरात बड़ा किया गया था, वह कीटनाशकों के अभाव में खराब निकली। क्या कुछ समय के लिए फोकस मीडिया के बढ़ते बाजार के बजाय योग्य शिक्षकों की खोज और उनके प्रशिक्षण पर किया जा सकता है? यह एक अलग बात है कि गूगल पर मीडिया शिक्षकों की तलाश करने पर नौ करोड़ से ज्यादा नतीजे मिलते हंै।
Monday, August 30, 2010
ये कैसी मानसिकता है !
ये लोग हिटलर के प्रचार मंत्री गोयबेल्स के चेले हैं। उसके दो सिद्धांत थे। एक – किसी भी झूठ को सौ बार बोलने से वह सच हो जाता है। दो – यदि झूठ ही बोलना है, तो सौ गुना बड़ा बोलो। इससे सबको लगेगा कि बात भले ही पूरी सच न हो; पर कुछ है जरूर। इसी सिद्धांत पर चलकर ये लोग अजमेर, हैदराबाद, मालेगांव या गोवा आदि के बम विस्फोटों के तार हिन्दू संस्थाओं से जोड़ रहे हैं। उन्हें लगता है कि दुनिया भर में फैले इस्लामी आतंकवाद के सामने इसे खड़ाकर भारत में मुसलमान वोटों की फसल काटी जा सकती है। सच्चर, रंगनाथ मिश्र और सगीर अहमद रिपोर्टों की कवायद के बाद यह उनका अगला कदम है।
सच तो यह है कि आतंकवाद का हिन्दुओं के संस्कार और व्यवहार से कोई तालमेल नहीं है। वैदिक, रामायण या महाभारत काल में ऐसे लोगों को असुर या राक्षस कहते थे। वे निरपराध लोगों को मारते और गुलाम बनाते थे। इसे ही साहित्य की भाषा में कह दिया गया कि वे लोगों को खा लेते थे; पर वर्तमान आतंकवादी उनसे भी बढ़कर हैं। ये विधर्मियों को ही नहीं, स्वधर्मियों और स्वयं को भी मार देते हैं।
हिन्दू चिंतन में ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ की भावना और भोजन से पूर्व गाय, कुत्तो और कौए के लिए भी अंश निकालने का प्रावधान है। ‘अतिथि देवो भव’ का सूत्र तो शासन ने भी अपना लिया है। अपनी रोटी खाना प्रकृति, दूसरे की रोटी खाना विकृति और अपनी रोटी दूसरे को खिला देना संस्कृति है। यह संस्कृति हर हिन्दू के स्वभाव में है। ऐसे लोग आतंकवादी नहीं हो सकते; पर मुसलमान वोटों के लिए एक-दो दुर्घटनाओं के बाद कुछ सिरफिरों को पकड़कर उसे ‘भगवा आतंक’ कहा जा रहा है।
कांग्रेस वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या विश्व हिन्दू परिषद और लश्कर, सिमी या हजारों नामों से काम करने वाले इन आतंकी गिरोहों को न जानते हों, यह भी असंभव है; पर आखों पर जब काला चश्मा लगा हो, तो फिर सब काला दिखेगा ही।
संघ को समझने के लिए बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं होती। देश भर में हर दिन सुबह-शाम संघ की लगभग 50,000 शाखाएं सार्वजनिक स्थानों पर लगती हैं। इनमें से किसी में भी जाकर संघ को समझ सकते हैं। शाखा में प्रारम्भ के 40 मिनट शारीरिक कार्यक्रम होते हैं। बुजुर्ग लोग आसन करते हैं, तो नवयुवक और बालक खेल व व्यायाम। इसके बाद वे कोई देशभक्तिपूर्ण गीत बोलते हैं। किसी महामानव के जीवन का कोई प्रसंग स्मरण करते हैं और फिर भगवा ध्वज के सामने पंक्तियों में खड़े होकर भारत माता की वंदना के साथ एक घंटे की शाखा सम्पन्न हो जाती है।
मई-जून मास में देश भर में संघ के एक सप्ताह से 30 दिन तक के प्रशिक्षण वर्ग होते हैं। प्रत्येक में 100 से लेकर 1,000 तक शिक्षार्थी भाग लेते हैं। इनके समापन कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में जनता तथा पत्रकार आते हैं। प्रतिदिन समाज के प्रबुध्द एवं प्रभावी लोगों को भी बुलाया जाता है। आज तक किसी शिक्षार्थी, शिक्षक या नागरिक ने नहीं कहा कि उसे इन शिविरों में हिंसक गतिविधि दिखाई दी है।
संघ के स्वयंसेवक देश में हजारों संगठन तथा संस्थाएं चलाते हैं। इनके प्रशिक्षण वर्ग भी वर्ष भर चलते रहते हैं। इनमें भी लाखों लोग भाग ले चुके हैं। विश्व हिन्दू परिषद वाले सत्संग और सेवा कार्यों का प्रशिक्षण देते हैं। बजरंग दल और दुर्गा वाहिनी वाले नियुद्ध ि(जूडो, कराटे) तथा एयर गन से निशानेबाजी भी सिखाते हैं। इससे मन में साहस का संचार होकर आत्मविश्वास बढ़ता है। इन शिविरों के समापन कार्यक्रम भी सार्वजनिक होते हैं। संघ और संघ प्रेरित संगठनों का व्यापक साहित्य प्राय: हर बड़े नगर के कार्यालय पर उपलब्ध है। अब तक हजारों पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं तथा करोड़ों पुस्तकें बिकी होंगी। किसी पाठक ने यह नहीं कहा कि उसे इस पुस्तक में से हिंसा की गंध आती है।
सच तो यह है कि जिस व्यक्ति, संस्था या संगठन का व्यापक उद्देश्य हो, जिसे हर जाति, वर्ग, नगर और ग्राम के लाखों लोगों को अपने साथ जोड़ना हो, वह हिंसक हो ही नहीं सकता। हिंसावादी होने के लिए गुप्तता अनिवार्य है और संघ का सारा काम खुला, सार्वजनिक और संविधान की मर्यादा में होता है। संघ पर 1947 के बाद तीन बार प्रतिबंध लग चुका है। उस समय कार्यालय पुलिस के कब्जे में थे। तब भी उन्हें वहां से कोई आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिली।
दूसरी ओर आतंकी गिरोह गुप्त रूप से काम करते हैं। वे इस्लामी हों या ईसाई, नक्सली हों या माओवादी कम्यूनिस्ट; सब भूमिगत रहकर काम करते हैं। उनके पर्चे किसी बम विस्फोट या नरसंहार के बाद ही मिलते हैं। उनके प्रशिक्षण शिविर पुलिस, प्रशासन या जनता की नजरों से दूर घने जंगलों में होते हैं। ये गिरोह जनता, व्यापारी तथा सरकारी अधिकारियों से जबरन धन वसूली करते हैं। न देने वाले की हत्या इनके बायें हाथ का खेल है। ऐसे सब गिरोहों को बड़ी मात्रा में विदेशों से भी धन तथा हथियार मिलते हैं।
हिन्दू संगठनों की प्रेरणा हिन्दू धर्मग्रन्थ ही होते हैं; और किसी धर्मग्रन्थ में निरपराध लोगों की हत्या करने को नहीं कहा गया हैं। हां, अत्याचारी का वध जरूर होना चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता का तो यही संदेश है; लेकिन दूसरी ओर इस्लाम, ईसाई या कम्युनिस्टों के मजहबी ग्रन्थों में अपने विरोधी को किसी भी तरह से मारना उचित कहा गया है। विश्व भर में फैली मजहबी हिंसा का कारण यही किताबें हैं। अधिकांश लोग इन्हें गलती से धर्मग्रन्थ कह देते हैं, जबकि ये मजहबी किताबें हैं।
संघ और वि.हि.परिषद का जन्म हिन्दू समाज को संगठित करने के लिए हुआ है; और हिंसा से विघटन पैदा होता है, संगठन नहीं। संघ मुस्लिम और ईसाई तुष्टीकरण का विरोधी है। वह उस मनोवृति का भी विरोधी है, जिसने देश को बांटा और अब अगले बंटवारे के षडयन्त्र रच रहे हैं। इसके बाद भी संघ का हिंसा में विश्वास नहीं है। वह मुसलमान तथा ईसाइयों में से भी अच्छे लोगों को खोज रहा है। संघ किसी को अछूत नहीं मानता। उसे सबके बीच काम करना है और सबको जोड़ना है। ऐसे में वह किसी वर्ग, मजहब या पंथ के सब लोगों के प्रति विद्वेष रखकर नहीं चल सकता।
इसलिए भगवा आतंक का शिगूफा केवल और केवल एक षड्यंत्र है। यह खिसियानी बिल्ली के खंभा नोचने का प्रयास मात्र है। दिग्विजय सिंह हों या उनकी महारानी, वे आज तक किसी इस्लामी आतंकवादी को फांसी नहीं चढ़ा सके हैं। अब भगवा आतंक का नाम लेकर वे इस तराजू को बराबर करना चाहते हैं। उनका यह षड्यंत्र हर बार की तरह इस बार भी विफल होगा।
Sunday, August 15, 2010
जश्ने आजादी के ६३ साल .
कोई बात है इस देश की मिटटी में जिसकी खुशबु ही मर मिटने का जज्बा पैदा कर देती है, देश के लिए प्राण देने के वालो की फसल तैयार करती रहती है.हालाँकि वक़्त बदला है क्योंकि भारत मां अब बलिदान नहीं योगदान मांगती है. इसकी 1 अरब 20 करोड़ संताने ही इसकी ताकत हैं.कुछ बच्चे बिगड़ गए हैं लेकिन फिर भी इस भीड़ में लाखो भगत और बिस्मिल घूम रहे हैं जिनका एक ही धर्म है "भारतीय",एक ही जाति "भारतीय" एक ही मकसद है "स्वाबलंबी और मजबूत भारत"
भारतीय - एक शब्द जिसके आगे हर सम्मान, हर उपाधि, हर पुरुस्कार छोटा लगता है,
मुझे गर्व है कि मैं इस देश में पैदा हुआ जहाँ देवता भी जन्म लेने को तरसते हैं, मुझे गर्व है कि मैं भारतीय हूँ. आइये अपने इतिहास से प्रेरणा लेकर एक सुनहरा वर्तमान रचते हैं. जय हिंद
Sunday, July 18, 2010
बिहार में मीडिया का असली चेहरा क्या है ?
किसका मीडिया, कैसा मीडिया। जवाब सीधा है, पूंजीपतियों का मीडिया। सामंतों का मीडिया। दलालों का मीडिया। समरथ को नहीं दोष गोषाईं… आदि-आदि का मीडिया। जी हां, मीडिया की परिभाषा आज बदल चुकी है। मीडिया यानी खबरों, विचारों और मनोरंजन को लोगों तक पहुंचाना अब गाली लगती है। खबरें, साबुन, सर्फ, पेस्ट की तरह इस्तेमाल होने लगी हैं। सवाल है कि इस्तेमाल आखिर कौन कर रहा है। पत्रकार या मालिक। जाहिर है लाखों-करोड़ों पैसा लगाने वाला मीडिया हाउस का मालिक। फिर मीडिया किसका मीडिया हुआ? खबर खबर नहीं, विचार विचार नहीं, मनोरंजन मनोरंजन नहीं। वह बन जाता है उपभोक्ता वस्तु। फिर खबर हो या साबुन क्या फर्क पड़ता है, जब दोनों को बेचना ही है। खबरें भी ‘प्रोडक्ट’ की तरह बेची जा रही हैं। कहा जा सकता है कि बाजार तैयार हो चुका है। बल्कि मीडिया में बाजार घुस चुका है।
मीडिया के माध्यम से खबरों को बेचने का कारोबार फल-फूल रहा है। घटनाएं कई हैं, जो किसका मीडिया और कैसा मीडिया को नंगा करने के लिए काफी है। मीडिया के लिए उर्वर जमीन माने जाने वाले बिहार के मीडिया पर नजर डालते हैं। घटना है, बिहार की राजधानी पटना में राष्ट्रमंडल खेल के लिए देश भ्रमण पर निकले क्विंस बैटन रिले की। गत 14 जुलाई को क्विंस बैटन रिले पटना में आयोजित की गयी। ताम-झाम, धूम-धड़ाम के साथ रिले निकला। इसमें राजनेता, अधिकारी, हीरो-हिरोइन, खिलाड़ी, संस्कृतिकर्मी, पत्रकार, लेखक सहित आमजनों की भागीदारी रही। राजभवन से राज्यपाल ने बैटन को कला और संस्कृति विभाग के सचिव को सौंपा। उसके बाद बैटन रिले की यात्रा शहर के पैंतीस पड़ावों पर होते हुए श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल पर जाकर समाप्त हुआ। पैंतीस पड़ावों पर बैटन को लेकर आगे बढ़ने वालों में राजनेता से लेकर पदाधिकारी, हीरो होंडा के पदाधिकारी और बिहार के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर के कई खिलाड़ी और एक अभिनेत्री शामिल थी। क्विंस बैटन रिले को कवर करने वालों में प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया का हुजूम भी पूरी तन्मयता से मौजूद रहा। बिहार के मीडिया ने क्विंस बैटन रिले के कवरेज को प्राथमिकता से जगह दी। मामला राष्ट्र हित का था और होना भी चाहिए था।
बिहार से प्रकाशित सभी अखबारों ने पहले पेज पर जगह दी। लेकिन बिहार के मीडिया का चेहरा एक बार फिर साफ हो गया कि आखिर उसकी सोच क्या है? यानी किसका मीडिया, कैसा मीडिया और किसके लिए? प्रश्न सामने आ ही गया। लोग भी चौंके। क्विंस बैटन रिले खबर तो बनी। अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू समाचार पत्रों ने क्विंस बैटन रिले की खबर तस्वीर मुख्यपृष्ठ पर तस्वीर के साथ प्रकाशित की। लेकिन बैटन के साथ कोई खिलाड़ी नजर नहीं आया। नजर आयी जानी-मानी फिल्म अभिनेत्री नीतू चंद्रा। राज्यपाल के साथ बैटन थामे नीतू की तस्वीर ने मीडिया की सोच को सामने ला दिया। वहीं एक अंग्रेजी और उर्दू के अखबार ने राज्यपाल को फोटो से हटाकर नीतू चंद्रा को क्विंस बैटन के साथ की तस्वीर को मुख्यपृष्ठ पर प्रकाशित किया। आश्चर्य की बात यह है कि रिले के दौरान क्विंस बैटन को थामने वालों में कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी मौजूद थे, लेकिन उनकी तस्वीर बैटन लिये हुए मुख्यपृष्ठ पर खबर नहीं बनी? एक बार फिर मीडिया ग्लैमर सेलिब्रेटरी के आगोश में समा गया। खेल प्रेमी हताश हुए, निराश हुए।
मीडिया के इस रवैये को लेकर खेल पत्रकारों और खेल प्रेमियों के पेट में गुदगुदी भी हुई। लेकिन गुदगुदी से उठी हंसी में मीडिया के रवैये के प्रति गुस्से का इजहार था, पीड़ा थी। मीडिया के अंदर और मीडिया के बाहर सवाल यहां उठता है किसका मीडिया? जी हां, जिसका मीडिया है, मालिक का – तो वह चीजों को अपनी तरह से ही लोगों के सामने परोसेगा ही? न कि जनता से पूछकर? स्वीटीः हाई प्रोफाइलः के पेट में दर्द होता है तो मीडिया खबर को उछाल-उछाल कर बवाल मचा देती है जबकि कजरी: गरीब-गुरबाः के पेट में दर्द होता है तो उसे नोटिस तक नहीं लिया जाता। मीडियाकर्मियों का मालिक कहता है कि उसे सुंदर चेहरे दिखाना है, सेलिब्रेटरी को दिखाना है। जो बिके, उसे खबर बनानी हैं। हो यही रहा है। मटुक-जूली की प्रेम कहानी, राखी-मीका की लड़ाई, अभिषेक व धोनी की शादी, कमिश्नर के कुत्ते, बिल्ली के छज्जे पर चढ़ जाने सहित कई खबरें हैं, जिन्हें मीडिया ने जमकर बेचा। वही जनहित की खबरें आयीं भी तो महज दिखावे के लिए।
Sunday, April 11, 2010
नक्सलियों के अबतक के सबस
Friday, March 26, 2010
हाँ कर दे !
आज देखना भी गवारा नहीं करते ।।
हमसे क्या हुई ख़ता इतना तो बता दे ।
रहमत होगी अगर तू पास आये ।।
मैं हर मुिश्कल से लड़ लेता ।
तुम अगर साथ देते ।।
ऐ दोस्त आजा तू एक बार ।
स्ुना सुना सा है दिल मेरा ।।
बस कह दे तू हाँ मेरे यार एक बार ।
दूर ही सही कि तू मेरे पास है ।।
हवाएं ले आयेंगी तेरी खुश्बू ।
Monday, March 22, 2010
क्या मैं महिला आरक्षण विरोधी हूँ ?
कांग्रेस और बीजेपी भले ही व्हिप जारी करके अपने सांसदों को महिला आरक्षण पर वोट डालने के लिए राजी कर लें, सच्चाई ये है कि कांग्रेस-बीजेपी दोनों के बहुतायत सांसद महिला आरक्षण के विरोधी हैं। इसीलिए लालू प्रसाद यादव के ये कहने पर कि 90 प्रतिशत कांग्रेसी सांसद कह रहे हैं कि महिला आरक्षण डेथ वारंट है, इससे बचा लीजिए तो, भी कांग्रेस की ओर से इसका कोई कड़ा प्रतिकार नहीं आय़ा। ये तो हुई महिला आरक्षण के अंटकने की बात लेकिन, क्या महिला आरक्षण मिल जाए तो, लोकतंत्र सुधर जाएगा। संसद की 33 प्रतिशत सीटों के जरिए उनको उनका हक मिल जाएगा। जवाब ईमानदारी से खोजेंगे तो, साफ पता चलेगा कि जवाब ना में है।
महिला आरक्षण कांग्रेस और बीजेपी दोनों के लिए उबले आलू की तरह है जो, न तो उगलते बन रहा है न निगलते। लेकिन, ये राष्ट्रीय पार्टियां हैं और इनके बड़े नेताओं को भरोसा है कि किसी न किसी सीट से वो तो, जीतकर संसद में पहुंच जाएंगे। डरे छोटे नेता जो, टिकट के लिए संघर्ष करते और अपनी जमीन बताने निपट जाते हैं उन्हें ये आरक्षण अपनी गर्दन पर रखी छुरी की तरह लग रहा है। और, सच्चाई भी यही है कि ये आरक्षण देश में लोकतंत्र का इतिहास बदलेगा लेकिन, साथ में लोकतंत्र का मखौल बनाने का जरिया भी बन जाएगा।
अब सोचिए जरा महिला आरक्षण मतलब 100 में से 33 सीटों पर सिर्फ महिलाएं लड़ेंगी, पुरुषों को लड़ने का हक ही नहीं होगा। यानी प्रतिस्पर्द्धा से नेतृत्व निखरने की लोकतंत्र की पहली शर्त पर ही महिला आरक्षण चोट करेगा। जाहिर है महिलाओं के लिए आरक्षित लोकसभा सीट पर कोई पुरुष नेता नहीं बनना चाहेगा और वो, क्षेत्र के लिए चिंता बिल्कुल ही छोड़ देगा। और, चूंकि ये आरक्षण रोटेशनल आधार पर यानी एक बार ये लोकसभा तो, दूसरी बार बगल वाली लोकसभा को महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिया जाएगा। तो, जाहिर है जाने-अनजाने इन क्षेत्रों से स्वाभाविक नेतृत्व ही खत्म होता जाएगा। इस आरक्षण का फायदा उन सामंती परिवारों को आसानी से मिल जाएगा जो, राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक-अपराधिक तौर पर पहले से बेहद बलशाली भूमिका में हैं। होगा ये कि अपराधियों को खत्म करने की संभावना दिखाने वाला ये महिला आरक्षण, महिलाओं की आड़ में अपराध रक्षण का बड़ा हथियार बन जाएगा। ये दलिता, पिछड़े आरक्षण की तरह नहीं है। जरा सोचकर बताइए ना किस बाहुबली सवर्ण या फिर बाहुबली दलित-पिछड़े के घर की महिलाओं को उनका अधिकार न देने की ताकत सामान्य लोगों में होती है। किसी राजनीतिक तौर पर प्रभावशाली परिवार चाहे वो, जिस जाति का हो, उस परिवार की महिलाओं का हक भला कौन मार रहा है या मार सकता है।
मुझे चक दे इंडिया फिल्म का वो, दृश्य याद आ रहा है जिसमें महिला हॉकी टीम कड़े मुकाबले में पुरुषों से हार जाती है लेकिन, ऐसा जज्बा उनके दिलो दिमाग में घर कर जाता है कि वो, वर्ल्ड कप हासिल करके लौटती हैं। मेरा तर्क ये है कि अगर महिलाओं को सही मायनों में पुरुषों के बराबर हक देने की बात हो रही है तो, महिलाओं के लिए अलग कोना खोजकर उन्हें कमजोर ही बनाए रखने की और देश में नेतृत्व खत्म करने वाला ये बिल क्यों लाया जा रहा है।
तर्क ये आता है कि महिलाओं को आरक्षण मिलेगा तो, कम से कम 33 प्रतिशत सीटों पर महिलाएं तो, आएंगी। और, इससे लोकसभा का माहौल सुधरेगा। ये आरक्षण के बूते संसद में पहुंची महिलाएं कैसे माहौल सुधार पाएंगी। वो, भी ज्यादातर ऐसी होंगी जो, बमुश्किल ही अपनी ही पार्टी में मौजूद नेता पति की आज्ञा की अवहेलना कर सकेंगी। और, अगर महिलाओं को आरक्षण दिए बिना उनका हक नहीं मिलेगा ऐसी सोच है तो, पुरुषों के साथ मैदान में ताल ठोंककर सबको चित करने वाली भारतीय राजनीति में सबसे ताकतवर (महिला या पुरुष) सोनिया गांधी जैसा नेतृत्व आरक्षण से पैदा होने की उम्मीद हम कैसे पाल पाएंगे। भले ही सोनिया के नाम के आगे गांधी लगा हो लेकिन, जिस तरह विदेशी मूल की बहती विरोधी बयार के बीच इस महिला ने खुद को साबित किया है वो, दिखाता है कि नेतृत्व चाहे महिला का हो या पुरुष का बिना प्रतियोगी माहौल के बेहतर नहीं हो सकता है।
लोकसभा में भाजपा नेता सुषमा स्वराज और कम्युनिस्ट पार्टी की पहली महिला पोलित ब्यूरो सदस्य वृंदा करात ही भला किस महिला आरक्षण से इतनी प्रतिभा जुटा पातीं। किस पुरुष राजनेता में इतनी ताकत है कि वो मायावती, ममता बनर्जी, जयललिता को खारिज करने का साहस जुटा सके। महिलाएं लोकसभा-विधानसभा में चुनकर आएं समस्या इससे नहीं है। समस्या इससे है कि संसद-विधानसभा में पहुंचने का लॉलीपॉप देकर महिलाओं के लिए एक अलग कमजोर कोना तैयार कर दिया जाए। समस्या इससे है कि महिलाओं को उनका हक देने के परदे के पीछे हमेशा महिलाओं को पुरुषों से कमजोर साबित कर दिया जाए।
लालू-मुलायम के भले ही इसके विरोध में अपने दूसरे हित छिपे हों। लेकिन, मुलायम की ये बात ज्यादा दमदार लगती है कि पार्टियों को खुद से क्यों नहीं महिलाओं को टिकट देना चाहिए। चुनाव आयोग उनकी मान्यता समाप्त करने का डर भी उन्हें दिखा सकता है। टिकट के दंद फंद में महिलाएं न फंसें ये तो, फिर भी जायज माना जा सकता है चुनावी दौड़ में आधी आबादी पुरुषों को लड़ाई से ही बाहर कर दिया जाए ये तो, एक नई विसंगति पैदा करने की कोशिश है।
राजनीति में ही नहीं कॉरपोरेट और दूसरे क्षेत्रों में जिन महिलाओं ने बिना आरक्षण के अपना मुकाम बनाया है उनकी ताकत सब मानते हैं वरना तो, ज्यादातर बॉसेज की सेक्रेटरी का पद महिलाओं के लिए ही आरक्षित होता है। लेकिन, क्या वो महिला को उसका हक दिला पाता है। क्या वो, महिला सशक्तिकरण के दावे को मजबूत करता है। बिल्कुल नहीं। महिला सशक्तिकरण का दावा मजबूत होता है। पेप्सिको चेयरमैन इंदिरा नूई के कामों से, ICICI बैंक की CEO चंदा कोचर से, HSBC की नैना लाल किदवई से, पहली महिला IPS अधिकारी किरण बेदी को देखकर महिलाओं को मजबूती मिलती है। ये लिस्ट इतनी लंबी है कि किसी के लिए उसे एक जगह संजोना मुश्किल है।
इसलिए भारतीय राजनीति में महिला आरक्षण के लिए जरिए सामंती परंपरा को और मजबूत करने की कोशिश का विरोध होना चाहिए। भारतीय नेतृत्व को कमजोर करने की इस कोशिश का विरोध होना चाहिए। महिलाओं को पुरुषों की प्रतियोगिता से बचाकर उन्हें पुराने जमाने में ठेलने की इस कोशिश का विरोध होना चाहिए। राजनीति में महिलाओं को उनका हक देना ही है तो, कांग्रेस-बीजेपी अगले किसी भी चुनाव में 33 प्रतिशत क्या पचास प्रतिशत महिलाओं को टिकट देकर महिला सशक्तिकरण पर अपना भरोसा दिखा सकती हैं। किसी अपराधी, बाहुबली, धनपशु के खिलाफ किसी भी महिला को शायद ज्यादा लोगों का समर्थन मिल जाएगा। सोचिए क्या महिला आरक्षण देश में एक अजीब विसंगति की जमीन नहीं तैयार कर रहा है। इसलिए महिलाओं के हक के लिए महिला आरक्षण का विरोध कीजिए। क्योंकि, सच्चाई यही है कि अगर महिलाओं की सीट आरक्षित हुई तो, ये प्रभावशाली लोगों (राजनैतिक-आर्थिक-अपराधिक) के पूरे परिवार को आसानी से संसद और विधानसभा में पहुंचने में मदद करेगा।
ये विकास है या पतन ?......
UTV Bindass चैनल पर एक शो आजकल आ रहा है इमोशनल अत्याचार। ये फिल्म DEV D के गाने कैसा तेरा जलवा ... कैसा तेरा प्यार .. तेरा इमोशनल अत्याचार। फिल्म में अभिनेता के इमोशनल अत्याचार में ढेर सारी लड़कियों के साथ संबंध थे तो, बिंदास के शो में लड़की या लड़का अपने प्रेमी की परीक्षा लेता है जिसमें अकसर लड़की का प्रेमी चैनल की हीरोइन के चक्कर में फंस ही जाता है। ये एक नमूना है। इसी चैनल की नई प्रोमो लाइन में एक लड़की कहती है कि बिंदास हूं इसका मतलब ये तो नहीं कि मैं सबके साथ सोने के लिए तैयार हूं। ऐसी ही लड़का कहता है कि मैं बिंदास हूं इसका मतलब ये नहीं कि मैं ड्रग्स लेता हूं।
सबसे ज्यादा सुना जाने वाले रेडियो स्टेशन का दावा करने वाला RED FM का स्लोगन है ये आप के जमाने का रेडियो स्टेशन है, बाप के जमाने का नहीं। आप के जमाने का रेडियो स्टेशन साबित करने के लिए गाने के बीच-बीच में रेडियो जॉकी सवाल पूछता रहता है कि क्या आपको लगता है कि रियलिटी शोज हमारी संस्कृति भ्रष्ट कर रहे हैं या फिर क्या आपको बड़े होकर डॉक्टर, इंजीनियर या वकील बनना है तो, काइंडली कट लीजिए क्योंकि, ये आज के जमाने का रेडियो स्टेशन है बाप के जमाने का नहीं। वैसे तो, ये सुनते वक्त बस बिंदास रेडियो जॉकी की चुहलबाजी या रेडियो स्टेशन की मस्ती भर लगती है लेकिन, थोड़ा ध्यान से सुनें तो, समझ में आता है कि ये सचमुच कैसे हंसते-गाते हमारी संस्कृति का बैंड बजा देते हैं।
RED FM पर गाने सुनते हुए मैं वैलेंटाइन डे के आसपास सफर कर रहा था। रास्ते में एक रेडियो डॉकी का नाम सुना तो, दंग रह गया। उसने चहकते हुए बताया मैं हूं हरामखोर अविनाश। वो, पूरे कार्यक्रम के दौरान लड़के-लड़कियों से अपनी हरामखोरी साबित करने को कह रहा था। और, हरामखोरी मैसेज करने के लिए नंबर भी बता रहा था साथ ही ये प्रलोभन भी कि अगर हरामखोरी जंची तो, वैलेंटइन डे पर वो, बेहतरीन हरामखोरी भेजने वाले लड़के या लड़की को स्टूडियो बुलाएगा। वैलेंटाइन डे के शो का नाम भी था लगी लव की। लव की लगती भी है ये पहली बार सुना।
विज्ञापन भी कुछ इसी तरह से बदलते जमाने के लड़के-लड़कियां तैयार कर रहे हैं। सुरीले जिंगल और प्रति सेकेंड प्लान के साथ मोबाइल बाजार में उतरा टाटा डोकोमो का विज्ञापन में एक लड़का-लड़की साथ बैठे हैं। लड़के की नजर एक दूसरी लड़की पर पड़ती है और वो, लड़की को बातों में फंसाकर दूसरी लड़की के साथ जरा मस्ती के चक्कर में उठता है जाते समय देखता है कि उसकी गर्लफ्रेंड ने दूसरा ब्वॉयफ्रेंड पकड़ लिया। थोड़ा सा वो, हतप्रभ दिखता है फिर मुस्कुराता है और नई गर्लफ्रेंड के साथ चल देता है। पीछे से टाटा डोकोमो का संदेश सुनाई देता है when everyday there is new plan then why take fix mobile plan. Tata docomo daily plan. ये नए जमाने का दर्शन हम जैसे लोगों को डरा रहा है। शायद हम पुरातनपंथी हो रहे हैं क्या पता नहीं।
Friday, March 12, 2010
पिछले दिनों कालेज परिसर में होली खेलने के जुर्म में कुछ विद्यार्थियों के पहचान पत्र ले लिए गए.....क्यों हिल गए न कि भारत में भी ऐसा हो सकता है ....जी हाँ जामिया मिल्लिया इस्लामिया में होली के पहले कुछ विद्यार्थियों ने एक दुसरे को रंग गुलाल लगाने शुरू किये ।कुछ देर बाद ही गार्ड ने आ कर उन सभी विद्यार्थियों को पहचान पत्र देने को कहा , इससे पहले कि वो लोग कुछ समझ पाते उन्हें प्रोक्टर के पास ले जाया गया । विद्यार्थियों ने बताया भी कि उन्हें नहीं पता कि जामिया में होली खेलना मन है ,नाहीं कही नोटिस लगे गई थी,लेकिन उन्हें तुरंत घर चले जाने को कहा गया। छात्रों के सामने ही एक गार्ड ने वारलेस से सभी गार्डों को सुचना दी कि कैम्पस में घूमते रहो अगर कोई होली खेलता दिखे तो पकर के ले आओ । खैर ..छात्र बिना आई कार्ड के ही वापस आ गए ।
होली के बाद उनके आई कार्ड डिपार्टमेंट में ये कह कर भेज दिया गया कि ये लोग शोर मचा रहे थे जिससे दूसरी class disturb हो रही थी जबकि वहां एक ही क्लास हो रही थी वो भी दूर ...... मामले पर लिपा-पोती करने के लिए झूट का सहारा लिया जा रहा है। बेचारे विद्यार्थी सोच-सोच के परेशान हो रहे हैं कि जब उसी परिसर में ईद पर गले मिल सकते हैं ,इफ्तार कर सकते हैं, यहाँ तक कि डिपार्टमेंट कि तरफ से इफ्तार पार्टी का आयोजन किया जाता है .........तो फिर होली खेलने पे उनके साथ ऐसा क्यूँ हुआ? जबकि जामिया को गंगा-जमुनी तहज़ीब के लिए जाना जाता है । इस घटना के बाद गंगा-जमुनी तहज़ीब कि पोल खुलती नज़र आ रही है। आपकी क्या राय है हमे ज़रूर बताएं.......
Friday, March 5, 2010
उठो ,जागो और आगे बढ़ो ........
शिवेन्दु राय